बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के दायरे को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी, जैसे विवाह पंजीयन आवेदन, जन्मतिथि, पहचान पत्र और अन्य व्यक्तिगत दस्तावेज, किसी तीसरे पक्ष को आरटीआई के तहत उपलब्ध नहीं कराए जा सकते, जब तक कि उनसे जुड़ा कोई व्यापक जनहित साबित न हो। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने इसी आधार पर दो याचिकाएं खारिज कर दीं।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन अधिनियम की धारा 8(1)(जे) व्यक्तिगत निजता की सुरक्षा का भी स्पष्ट प्रावधान करती है। ऐसे में निजी जानकारी का खुलासा केवल असाधारण परिस्थितियों और बड़े जनहित में ही किया जा सकता है।
मामले में अंबिकापुर निवासी डी.के. सोनी ने सूरजपुर जिले के अपर कलेक्टर एवं विशेष विवाह अधिकारी के समक्ष कपिल देव पैकरा और लवकेश कुमार पैकरा द्वारा प्रस्तुत विवाह पंजीयन आवेदन, उससे जुड़े दस्तावेज, आदेश और इश्तहार की प्रमाणित प्रतियां आरटीआई के तहत मांगी थीं। जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि आवेदक तीसरा पक्ष है और मामला न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित है।
इसके बाद सोनी ने राज्य सूचना आयोग, रायपुर में द्वितीय अपील दायर की, जिसे आयोग ने 10 अक्टूबर 2019 को खारिज करते हुए जन सूचना अधिकारी के निर्णय को सही माना। आयोग के आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह पंजीयन आवेदन में नाम, पता, फोटो, जन्मतिथि और पहचान पत्र जैसे संवेदनशील व्यक्तिगत विवरण शामिल होते हैं। यदि आवेदक भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग या किसी अन्य बड़े जनहित का ठोस आधार प्रस्तुत नहीं करता, तो ऐसी जानकारी देना संबंधित व्यक्ति की निजता का अनावश्यक उल्लंघन होगा। इसी आधार पर अदालत ने याचिकाएं खारिज कर दीं।




