बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि प्रोपराइटरशिप फर्म के मालिक की मृत्यु के बाद उसके कानूनी उत्तराधिकारियों से पुराने सर्विस टैक्स की वसूली नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि मृत करदाता के वारिसों के खिलाफ रिकवरी नोटिस जारी करना या उनके बैंक खाते और संपत्ति कुर्क करना कानून के अनुरूप नहीं है।
न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने भिलाई के रिसाली निवासी देवन अनीषा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के दिवंगत पति महेंद्रन रूपेश नायडू एम/एस महेंद्रन रूपेश नायडू नाम से प्रोपराइटरशिप फर्म संचालित करते थे और सब-कॉन्ट्रैक्टर के रूप में कार्य करते थे। जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग ने वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए 12 अक्टूबर 2018 को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसके बाद 30 जून 2020 को पारित आदेश में ₹10,74,919 सर्विस टैक्स और इतनी ही राशि का जुर्माना लगाया गया। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील भी खारिज हो गई। इस बीच 3 मई 2023 को महेंद्रन रूपेश नायडू का निधन हो गया।
इसके बावजूद विभाग ने 13 दिसंबर 2024 को उनकी पत्नी और उनके बैंक खातों के खिलाफ फाइनेंस एक्ट, 1994 की धारा 87(बी) तथा सीजीएसटी एक्ट की धारा 142 के तहत रिकवरी और गार्निशी नोटिस जारी कर दिया।
हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि प्रोपराइटरशिप फर्म की कोई अलग कानूनी पहचान नहीं होती और प्रोपराइटर की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों से सर्विस टैक्स की वसूली का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के ‘शबीना अब्राहम बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज’ मामले के फैसले का भी हवाला दिया गया।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने 13 दिसंबर 2024 को जारी रिकवरी और मांग नोटिस को पूरी तरह निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मृत प्रोपराइटर के कानूनी उत्तराधिकारियों के विरुद्ध इस प्रकार की वसूली की कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं है।




