नई दिल्ली: भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट में राज्यों की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंताजनक खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 सालों में 28 राज्यों का कुल कर्ज 17.57 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 59.60 लाख करोड़ रुपये हो गया है। यह रिपोर्ट कैग के के. संजय मूर्ति ने स्टेट फाइनेंस सेक्रेटरीज कॉन्फ्रेंस में जारी की।
कर्ज का बोझ और जीएसडीपी
रिपोर्ट के मुताबिक, 2022-23 के अंत तक 28 राज्यों पर कुल 59,60,428 करोड़ रुपये का कर्ज था, जो उनके कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 22.96 फीसदी है। 2013-14 में यह कर्ज 17,57,642 करोड़ रुपये था, जो जीएसडीपी का 16.66 फीसदी था। इस अवधि में कर्ज 3.39 गुना बढ़ा। 2022-23 में यह कर्ज देश की जीडीपी का 22.17 फीसदी था, जब देश की जीडीपी 2,68,90,473 करोड़ रुपये थी।
सबसे ज्यादा और सबसे कम कर्ज वाले राज्य
रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब का कर्ज उसके जीएसडीपी का 40.35 फीसदी है, जो सबसे ज्यादा है। इसके बाद नागालैंड (37.15 फीसदी) और पश्चिम बंगाल (33.70 फीसदी) का स्थान है। वहीं, सबसे कम कर्ज ओडिशा (8.45 फीसदी), महाराष्ट्र (14.64 फीसदी) और गुजरात (16.37 फीसदी) पर है।
सबसे ज्यादा कर्ज वाले राज्य
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पंजाब: 40.35%
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नागालैंड: 37.15%
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पश्चिम बंगाल: 33.70%
सबसे कम कर्ज वाले राज्य
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ओडिशा: 8.45%
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महाराष्ट्र: 14.64%
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गुजरात: 16.37%
राज्यों की कर्ज स्थिति
रिपोर्ट में बताया गया है कि 31 मार्च 2023 तक आठ राज्यों का कर्ज उनके जीएसडीपी का 30 फीसदी से अधिक था, जबकि छह राज्यों का कर्ज 20 फीसदी से कम था। बाकी 14 राज्यों का कर्ज जीएसडीपी का 20 से 30 फीसदी के बीच था। 11 राज्यों ने अपने खर्चों को पूरा करने के लिए उधार लिए गए धन का उपयोग किया।
कैग की यह रिपोर्ट राज्यों की बढ़ती कर्ज की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाती है और वित्तीय प्रबंधन में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है।




