बेंगलुरु/तिरुवनंतपुरम। केरल के प्रस्तावित मलयालम भाषा विधेयक 2025 ने एक बार फिर भाषा, पहचान और संवैधानिक अधिकारों की बहस को तेज कर दिया है। कर्नाटक सरकार ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे सिर्फ शैक्षणिक नीति नहीं, बल्कि सीमावर्ती कासरगोड जिले में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सीधा प्रहार बताया है।
मुख्यमंत्री सिद्दारमैया का बयान इस विवाद को प्रशासनिक दायरे से निकालकर राजनीतिक और संवैधानिक मंच पर ले आता है। उनका तर्क साफ है—कन्नड़ भाषा सीमावर्ती इलाकों में सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान और गरिमा का सवाल है। यदि मलयालम को पहली भाषा के रूप में अनिवार्य किया गया, तो कासरगोड के कन्नड़ भाषियों से उनकी मातृभाषा सीखने का अधिकार छिन सकता है।
यह मुद्दा नया नहीं है। 2017 में भी इसी तरह के प्रस्ताव को राष्ट्रपति ने खारिज किया था। उस फैसले की पृष्ठभूमि आज के विवाद को और गंभीर बनाती है। कर्नाटक इसे एक चेतावनी के रूप में देख रहा है—कि पहले खारिज हो चुके विचार को नए नाम और नए ढांचे में फिर से लाया जा रहा है।
केरल सरकार का पक्ष अलग है। उसका कहना है कि यह विधेयक राज्य की भाषाई पहचान को मजबूत करने और प्रशासनिक एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। जब राज्य की पहचान बचाने की कोशिश, दूसरे राज्य के सीमावर्ती नागरिकों की भाषाई आज़ादी से टकराने लगे, तब मामला केवल नीति का नहीं रहता।
कर्नाटक के अधिकारी इस विधेयक को सीधे संविधान से जोड़ रहे हैं। अनुच्छेद 30, 347, 350, 350क और 350ख—ये सभी भाषाई अल्पसंख्यकों के संरक्षण की बात करते हैं। कासरगोड जैसे बहुभाषी इलाके में एक ही भाषा को पहली भाषा बनाना, इन प्रावधानों की भावना के खिलाफ माना जा रहा है। खासतौर पर तब, जब यह नियम अल्पसंख्यक और निजी स्कूलों पर भी लागू हो।
कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण द्वारा केरल के राज्यपाल को सौंपा गया ज्ञापन इस लड़ाई को संवैधानिक रास्ते पर ले जाने का संकेत देता है। प्रतिनिधिमंडल की चिंता स्पष्ट है—अगर कक्षा एक से दस तक मलयालम अनिवार्य हुई, तो कन्नड़ माध्यम के स्कूलों की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाएगी। यह केवल शिक्षा नहीं, सांस्कृतिक अस्तित्व का सवाल बन जाएगा।
राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर का “व्यापक समीक्षा” का आश्वासन फिलहाल तनाव को ठंडा करने की कोशिश जरूर है, लेकिन समाधान नहीं। असली फैसला इस बात पर टिका है कि केरल सरकार भाषा नीति को पहचान की रक्षा तक सीमित रखती है या अल्पसंख्यक अधिकारों के साथ संतुलन बनाती है।
यह विवाद मलयालम बनाम कन्नड़ का नहीं है। यह सवाल है कि क्या भाषा को राज्य की एकरूपता का औजार बनाया जाएगा, या संविधान के तहत विविधता की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलेगी। अगर संतुलन नहीं बना, तो यह मामला अदालत से आगे बढ़कर संघीय ढांचे की नई परीक्षा बन सकता है।




