नई दिल्ली/रायपुर। भारत सरकार ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के नियमों में बड़ा और ऐतिहासिक संशोधन किया है। अब देश की केवल आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में बनी फिल्मों तक ही सीमित न रहकर, विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों में बनी फिल्मों को भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की दौड़ में शामिल किया जाएगा।
इस बदलाव के बाद अब किसी भी क्षेत्रीय बोली में बनी फिल्म राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए पात्र होगी, बशर्ते संबंधित राज्य के गृह सचिव या जिला कलेक्टर से उस बोली के प्रचलन का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा। यह निर्णय भारतीय सिनेमा जगत के लिए एक नई दिशा तय करने वाला साबित होगा।
इस ऐतिहासिक परिवर्तन के पीछे छत्तीसगढ़ के जाने-माने कलाकार अखिलेश पांडेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अखिलेश पांडेय ने बताया कि जब उनकी छत्तीसगढ़ी फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में स्थान नहीं मिला, तो वे बेहद निराश हुए। कारण यह था कि छत्तीसगढ़ी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है।
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उन्होंने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्री को पत्र लिखकर अपनी बात रखी। अपने पत्र में उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 63 से अधिक पुरस्कार जीते हैं और उसका नाम गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है, फिर भी उसे राष्ट्रीय पुरस्कार में स्थान नहीं मिला।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनके पत्र को गंभीरता से लिया और इसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भेजा। इसके बाद मंत्रालय ने नियमों में संशोधन कर क्षेत्रीय बोलियों में बनी फिल्मों को भी राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए पात्रता प्रदान करने का निर्णय लिया।
अखिलेश पांडेय ने कहा कि यह निर्णय केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के उन हजारों कलाकारों के लिए जीत है जो अपनी मातृभाषा या स्थानीय बोली में फिल्में बनाते हैं। अब भारत के हर क्षेत्र की आवाज़, हर बोली और हर संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान मिलने का अवसर मिलेगा।




