बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पंचायत नियमों के तहत नियुक्त शिक्षाकर्मी स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन होने से पूर्व ‘शासकीय सेवक’ की श्रेणी में नहीं आते। इसलिए उन्हें संविलियन से पहले की पंचायत सेवा के आधार पर 10 मार्च 2017 के सामान्य प्रशासन विभाग के सर्कुलर के तहत क्रमोन्नति (टाइम बाउंड प्रमोशन) का लाभ नहीं मिल सकता।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने आभा नामदेव एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य सहित कुल 1188 जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।
याचिकाकर्ता मूल रूप से मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ पंचायत शिक्षा कर्मी भर्ती एवं सेवा शर्तें नियम 1997, 2007 एवं 2012 के अंतर्गत पंचायतों द्वारा शिक्षा कर्मी वर्ग-1, 2 एवं 3 के रूप में नियुक्त किए गए थे। राज्य सरकार की 30 जून 2018 की संविलियन नीति के तहत इनका 1 जुलाई 2018 से स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि उन्होंने दस वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, इसलिए 10 मार्च 2017 के सर्कुलर के आधार पर प्रथम एवं द्वितीय क्रमोन्नति का लाभ उन्हें मिलना चाहिए। उन्होंने डिवीजन बेंच के सोना साहू प्रकरण तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य की अपील खारिज करने के निर्णय का हवाला दिया था।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने विरोध करते हुए कहा कि शिक्षाकर्मी पंचायत राज संस्थाओं के कर्मचारी थे तथा उनका कैडर नियमित शासकीय शिक्षकों से अलग था। 1999 की क्रमोन्नति योजना एवं 2017 का सर्कुलर केवल नियमित शासकीय कर्मचारियों पर लागू होता है। संविलियन नीति में स्पष्ट प्रावधान है कि सभी सेवा लाभ संविलियन की तिथि 1 जुलाई 2018 से ही देय होंगे तथा पूर्व की पंचायत सेवा को शासकीय सेवा में नहीं जोड़ा जाएगा।
न्यायालय ने पंचायत राज अधिनियम 1993, भर्ती नियमों तथा संविलियन नीति का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने माना कि पंचायतों द्वारा नियुक्त शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तें एवं वेतनमान स्कूल शिक्षा विभाग के नियमित शिक्षकों से पूरी तरह भिन्न थे। इसलिए संविलियन से पूर्व की सेवा को शासकीय सेवा नहीं माना जा सकता तथा क्रमोन्नति लाभ का दावा अस्वीकार्य है।
इसके साथ ही न्यायालय ने सभी 1188 याचिकाओं को खारिज कर दिया।




