महासमुंद/आरंग। जिले के ग्राम अछोली में संचालित पिकाडली बियर फैक्ट्री को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी संसाधनों के उपयोग पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि फैक्ट्री द्वारा समोदा बैराज से पाइपलाइन के माध्यम से पिछले लगभग दो वर्षों से पानी लिया जा रहा है, जबकि इस पूरी प्रक्रिया के लिए आवश्यक न तो जल संसाधन विभाग से कोई औपचारिक अनुबंध किया गया है और न ही संबंधित ग्राम पंचायतों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त किया गया है।
ग्रामीणों की शिकायत के बाद की गई पड़ताल में यह सामने आया कि ग्राम अछोली और अछोला की जमीन की खुदाई कर करीब 3 से 4 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है, जिसके जरिए फैक्ट्री तक पानी की आपूर्ति की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी संरचना के बावजूद संबंधित विभागों के पास इसकी स्पष्ट कागजी स्वीकृति उपलब्ध नहीं है। जल संसाधन विभाग, रायपुर डिवीजन फेस-2 के एसडीओ आनंद कुमार निकोशे ने भी यह स्वीकार किया है कि फैक्ट्री के साथ विभाग का कोई औपचारिक एग्रीमेंट नहीं किया गया है। ऐसे में यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर किस आधार पर बैराज से पानी उठाया जा रहा है।
मामले में ग्राम पंचायतों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। ग्राम पंचायत अछोली के सरपंच अमन कोशले ने प्रारंभिक बातचीत में NOC दिए जाने की बात कही, लेकिन जब इसकी प्रमाणित प्रति मांगी गई तो कई दिनों तक टालमटोल किया गया और बाद में संपर्क करना बंद कर दिया। वहीं ग्राम पंचायत अछोला के सरपंच संतोष साहू ने अपने गांव से पाइपलाइन गुजरने से ही इनकार करते हुए किसी भी प्रकार की NOC जारी करने की बात से साफ इंकार कर दिया। दोनों पंचायतों के बयानों में यह विरोधाभास पूरे मामले को और उलझा देता है।
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ग्रामीणों का आरोप है कि इस पूरे मामले की जानकारी जल संसाधन विभाग के अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को है, इसके बावजूद न तो पानी लेने की वैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई और न ही अब तक किसी प्रकार की कार्रवाई की गई है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि फैक्ट्री संचालक द्वारा कथित रूप से मोटे पैमाने पर लेन-देन किया गया है, जिसके चलते जिम्मेदार लोग चुप्पी साधे हुए हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से बिना स्पष्ट अनुमति के दो वर्षों से पानी आपूर्ति होने की बात सामने आ रही है, उससे मामला गंभीर हो जाता है।
नियमों के अनुसार किसी भी औद्योगिक इकाई को बैराज या नदी से पानी लेने के लिए जल संसाधन विभाग से पूर्व अनुमति और औपचारिक अनुबंध आवश्यक होता है। इसके अलावा पाइपलाइन बिछाने के लिए संबंधित भूमि और ग्राम पंचायतों की सहमति भी जरूरी होती है। इन प्रक्रियाओं का पालन न होना सीधे तौर पर नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब न कोई एग्रीमेंट है और न ही पंचायत स्तर पर स्पष्ट अनुमति, तो फिर यह व्यवस्था किसके संरक्षण में संचालित हो रही है। दो वर्षों से लगातार पानी की आपूर्ति और जिम्मेदारों की चुप्पी प्रशासनिक उदासीनता या संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
यह मामला अब केवल एक फैक्ट्री तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी संसाधनों के उपयोग, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है। क्या जांच कर सच्चाई सामने लाई जाएगी या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?




