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    Home » कलेक्टर जन-दर्शन में आत्मदाह की कोशिश, पत्नी-बच्चे थे संग… इच्छा मृत्यु की थी मांग

    कलेक्टर जन-दर्शन में आत्मदाह की कोशिश, पत्नी-बच्चे थे संग… इच्छा मृत्यु की थी मांग

    Shrikant BaghmareBy Shrikant BaghmareJune 2, 2026 रायपुर संभाग No Comments3 Mins Read

    धमतरी। कलेक्ट्रेट परिसर में मंगलवार को सिर्फ एक घटना नहीं हुई, बल्कि एक परिवार का दर्द सबके सामने फूट पड़ा। जनदर्शन में अपनी फरियाद लेकर पहुंचे एक पिता की आंखों में उम्मीद थी कि शायद आज उसकी बात सुनी जाएगी। साथ में पत्नी थी, दो मासूम बच्चे थे और मन में न्याय की आखिरी आस थी। लेकिन जब उसे लगा कि उसकी आवाज कहीं नहीं पहुंच रही, तो उसने ऐसा कदम उठा लिया जिसने पूरे परिसर को स्तब्ध कर दिया।

    धमतरी के पोस्ट ऑफिस वार्ड निवासी रोहित सोनी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जनदर्शन में पहुंचे थे। हाथ में आवेदन था, जिसमें उन्होंने अपने परिवार के लिए इच्छा मृत्यु की अनुमति तक मांगी थी। आवेदन के पीछे वर्षों का दर्द, बेबसी और असुरक्षा की भावना छिपी थी।

    रोहित का कहना है कि उनका परिवार करीब 60 सालों से बढ़ेश्वर महादेव मंदिर के पास अपने घर में रह रहा है। लेकिन अब हालात ऐसे बन गए हैं कि उन्हें अपना ही घर और अपना ही मोहल्ला पराया लगने लगा है। उनका आरोप है कि मकान निर्माण के दौरान कुछ लोगों ने काम रुकवा दिया, घर छोड़ने का दबाव बनाया और लगातार परेशान किया।

    जनदर्शन के बीच अचानक रोहित ने अपने ऊपर मिट्टी तेल छिड़क लिया। कुछ पल के लिए वहां मौजूद लोगों की सांसें थम गईं। पत्नी की आंखों में डर था, बच्चे घबराकर अपने पिता को देख रहे थे। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाला था। अगर अधिकारियों और कर्मचारियों ने समय रहते उसे नहीं रोका होता, तो एक बड़ा हादसा हो सकता था।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोई पिता अपने बच्चों के सामने ऐसा कदम उठाने को क्यों मजबूर होता है? कोई परिवार इच्छा मृत्यु की मांग क्यों करता है? क्या यह सिर्फ एक शिकायत है या फिर व्यवस्था तक न पहुंच पाने वाली पीड़ा की आखिरी चीख?

    रोहित का आरोप है कि उसके घर तक पहुंचने वाला रास्ता भी बाधित कर दिया गया है और कई शिकायतों के बावजूद उसे राहत नहीं मिली। न्याय की तलाश में भटकते-भटकते जब उम्मीद कमजोर पड़ने लगी, तब वह जनदर्शन में पहुंचा था। शायद उसे भरोसा था कि यहां उसकी बात सुनी जाएगी। लेकिन वहां जो हुआ, उसने पूरे जिले को सोचने पर मजबूर कर दिया।

    कलेक्ट्रेट परिसर में उस दिन सिर्फ हड़कंप नहीं मचा था, बल्कि एक परिवार की बेबसी सबके सामने खड़ी थी। एक पिता का दर्द, एक पत्नी की चिंता और दो बच्चों का डर प्रशासनिक फाइलों से कहीं बड़ा सवाल छोड़ गया है। क्या आम आदमी को अपनी बात सुनाने के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ेगी?

    फिलहाल प्रशासन ने जांच और कार्रवाई का आश्वासन दिया है। लेकिन उस परिवार की निगाहें अब आश्वासन पर नहीं, समाधान पर टिकी हैं। क्योंकि उम्मीद जब टूटने लगती है, तब इंसान सबसे खतरनाक फैसले लेने लगता है।

     

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