दुर्ग। जिले के धमधा में इस बार सिर्फ पपीते की फसल नहीं उजड़ी, किसानों की उम्मीदें भी खेतों में दफन हो गईं। जिन पौधों को किसानों ने महीनों तक बच्चों की तरह संभाला, जिन खेतों को हर सुबह उम्मीद से देखा, आखिर उन्हीं खेतों पर ट्रैक्टर चलाना पड़ा। हरे-भरे पपीते, जो कभी कमाई और खुशहाली का सपना थे, अब किसानों की बेबसी की कहानी बन गए।
पिछले साल अच्छे दाम मिले तो किसानों ने सोचा था कि इस बार घर की हालत सुधरेगी। किसी ने कर्ज लेकर खेती बढ़ाई, किसी ने बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतों के सपने देखे। लेकिन बाजार ने अचानक करवट बदल ली। पपीते का भाव इतना गिर गया कि लागत निकालना भी मुश्किल हो गया।
ऊपर से डीजल संकट ने बची हुई उम्मीद भी छीन ली। ट्रकों के पहिए थम गए और खेतों में तैयार फसल मंडियों तक पहुंच ही नहीं पाई। धमधा से पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली जाने वाले पपीते खेतों में ही सड़ने लगे। किसान देखते रहे… फल धीरे-धीरे पीले पड़ते गए, फिर खराब होने लगे।
आखिरकार किसानों को वही करना पड़ा, जो किसी भी अन्नदाता के लिए सबसे दर्दनाक होता है। अपनी मेहनत को खुद मिटाना। करीब 500 एकड़ में लगी पपीते की फसल ट्रैक्टर से रौंद दी गई।
यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं है। यह उस किसान की टूटती हिम्मत की कहानी है, जो हर बार मौसम, बाजार और व्यवस्था से लड़कर भी उम्मीद बोता है। लेकिन इस बार खेतों में पपीते से ज्यादा किसानों की आंखों में उगी उम्मीदें कुचल गईं।




