Khabarwaad National Desk: दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी के जिला अदालतों के जजों की ओर से दायर एक याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट, केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है. जिसमें जजों के लिए उपयुक्त सरकारी आवासीय आवास की मांग की गई है.
2 मई को पारित एक आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीत सिंह अरोड़ा की एक खंडपीठ ने प्रतिवादियों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई के लिए को 16 जुलाई की तारीख तय की. ‘बार एंड बेंच’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट में यह याचिका दिल्ली न्यायिक सेवा संघ ने दायर की है, जो राजधानी के न्यायिक अधिकारियों की एक प्रतिनिधि संस्था है.
अपनी याचिका में न्यायिक सेवा संघ ने अधिकारियों को दिल्ली न्यायिक सेवा के सभी अधिकारियों और दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारियों के रहने के लिए उपयुक्त और पर्याप्त सरकारी आवासों की उपलब्धता में तेजी लाने के लिए उचित कदम उठाने के निर्देश देने की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि मौजूदा वक्त में दिल्ली में न्यायिक अधिकारियों की कुल कार्यरत संख्या 823 है. जबकि न्यायिक पूल में केवल 347 आवासीय आवास उपलब्ध हैं.
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याचिका में कहा गया कि इस तरह दिल्ली में लगभग आधे न्यायिक अधिकारियों को कोई सरकारी आवास उपलब्ध नहीं कराया गया है. यह आंकड़े साफ तौर से दिखाते हैं कि दिल्ली में न्यायिक अधिकारियों के लिए सरकारी आवासों की उपलब्धता के मामले में मौजूदा स्थिति बहुत खराब है. इस याचिका में कहा गया है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में ही सभी न्यायिक अधिकारियों को सरकारी आवास उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को विशिष्ट निर्देश जारी किए थे. उस आदेश में कहा गया था कि जब तक राज्य का आवास उपलब्ध न हो, तब तक सरकार को न्यायिक अधिकारियों को आवास प्रदान करना चाहिए.
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हालांकि, तीस साल से अधिक समय पहले पारित ऐसे विशिष्ट निर्देशों के बावजूद दिल्ली में बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारियों को कोई आवासीय आवास प्रदान नहीं किया गया है. न्यायिक अधिकारियों को केवल बहुत कम मकान किराया भत्ता (एचआरए) और अन्य भत्तों की मदद से अपने आवास का इंतजाम करना पड़ता है. याचिका में कहा गया है कि जजों को दिया गया एचआरए शहर में उपयुक्त आवास हासिल करने के लिए बहुत कम है और यही कारण है कि उनमें से कई फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद में रह रहे हैं, जिससे उन्हें आने-जाने में भारी परेशानी होती है.




