बलरामपुर, छत्तीसगढ़। देश 15 अगस्त को आज़ादी का जश्न मना रहा था, लेकिन छत्तीसगढ़ के एक सामुदायिक अस्पताल में “शिक्षा के मंदिर” के एक पुजारी ने शराब पीकर ऐसा हंगामा किया कि स्वतंत्रता सेनानियों की आत्मा भी चौंक गई होगी। जी हाँ, बलरामपुर के शंकरगढ़ अंतर्गत रेहड़ा हाई स्कूल में पदस्थ शिक्षक प्रमोद एक्का ने अस्पताल में शराब के नशे में धुत होकर “हाईवोल्टेज ड्रामा” का ऐसा पाठ पढ़ाया जिसमें विषय था— तोड़फोड़, गाली-गलौज और पुलिस को ललकारना।
जानकारी के अनुसार, आरोपी शिक्षक प्रमोद एक्का रेहड़ा हाई स्कूल में पदस्थ है। 15 अगस्त की दोपहर वह अपने बीमार परिजन और अन्य लोगों के साथ शंकरगढ़ सामुदायिक अस्पताल पहुंचा था। इस दौरान उसने शराब के नशे में अस्पताल परिसर में हंगामा किया और तोड़फोड़ शुरू कर दी। स्थिति को संभालने के लिए परिजनों को मजबूरी में उसके हाथ-पैर बांधने पड़े।

इसी बीच पुलिस को सूचना दी गई और टीम मौके पर पहुंच गई। आरोपी ने पुलिसकर्मी से भी गाली-गलौच की। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ IPC की धाराएं 296, 351(2), 115(2), 132, 221, 324(3), लोक संपत्ति नुकसान अधिनियम 1984 की धारा 3, छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम 2002 की धारा 36(च)(2) और चिकित्सा सेवक सुरक्षा अधिनियम 2010 की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया। आरोपी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया है।
गुरुजी का अनोखा पाठ
- अस्पताल पहुँचे तो परिजन इलाज कराना चाहते थे, मगर गुरुजी ने इलाज के नाम पर शराब का नशा उतारना चुना।
- ब्लैकबोर्ड की जगह अस्पताल की दीवारें थीं और चॉक की जगह बोतलें।
- जब पुलिस आई तो गुरुजी ने “लोकतांत्रिक संवाद” की जगह गाली-गलौज का विशेष व्याख्यान दे डाला।
परिजन इतने परेशान हो गए कि उन्हें मजबूरी में अपने ही शिक्षक के हाथ-पैर बांधकर होमवर्क करवाना पड़ा —सीधा जेल तक का रास्ता।
सवाल जो उठते हैं
- जब गुरुजी ही नशे में धुत होकर उत्पात मचाएँ, तो बच्चों को क्या शिक्षा देंगे?
- क्या यही है “नई शिक्षा नीति” का जमीनी रूप, जहाँ क्लासरूम से ज्यादा दारू-रूम में शिक्षक सक्रिय हैं?
- शिक्षा विभाग की “निरीक्षण समितियाँ” आखिर निरीक्षण करती कहाँ हैं—स्कूल में या “किसी और ठिकाने” पर?
सरकार और शिक्षा विभाग को सुझाए जाने वाले कड़े कदम
- नशा मुक्ति टेस्ट अनिवार्य – जैसे छात्रों की परीक्षा होती है, वैसे ही शिक्षकों का हर 3 महीने में अचानक शराब टेस्ट कराया जाए।
- बायोमेट्रिक निगरानी – स्कूल की हाजिरी मशीन में एल्कोहल डिटेक्टर भी लगाया जाए।
- अनिवार्य प्रशिक्षण – शिक्षकों को बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ संयम और आचरण का प्रशिक्षण भी मिले।
- कठोर दंड व्यवस्था – शिक्षा के नाम पर कलंकित करने वाले ऐसे शिक्षकों की नौकरी तुरंत समाप्त की जाए और उन्हें जेल की “री-एजुकेशन क्लास” में भेजा जाए।
- जनजागरूकता अभियान – गाँव-गाँव जाकर यह संदेश दिया जाए कि “शराब से शिक्षक तो गिरते ही हैं, साथ में पूरा भविष्य भी गिरा देते हैं।”




