सूरजपुर। यह कहानी सिर्फ़ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आईना है। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में सांप के काटने के बाद पति-पत्नी की जान इसलिए नहीं बच सकी क्योंकि अस्पताल पहुँचाने से पहले परिजनों ने उन्हें घंटों तक झाड़-फूंक में उलझाए रखा। नतीजा यह हुआ कि ज़हर तो डॉक्टर निकाल सकते थे, पर अंधविश्वास का ज़हर जान ले गया।
भैयाथान इलाके के ग्राम बसकर डालाबहरा के तुलेश्वर सिंह और उनकी पत्नी गीता सिंह रात में फर्श पर सो रहे थे। सांप ने काटा, परिजन अस्पताल ले जाने की बजाय ओझा-बाबा के भरोसे बैठ गए। कई घंटे ‘टोटका’ चलता रहा और तब तक गीता की सांसें थम गईं। तुलेश्वर को जब तक जिला अस्पताल पहुंचाया गया, वहां डॉक्टरों ने उन्हें भी मृत घोषित कर दिया। पीछे रह गए उनके चार मासूम बच्चे—जिनकी मासूमियत शायद यह सवाल पूछ रही होगी कि “मां-बाप को सांप ने मारा या अंधविश्वास ने?”
यह घटना कोई पहली नहीं है। गांव-देहात में आज भी लोग वैज्ञानिक इलाज की बजाय झाड़-फूंक में यक़ीन करते हैं। सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर करोड़ों खर्च करती है, लेकिन असली लड़ाई दवाओं से नहीं, दिमाग़ों से है।
कटाक्ष यही है कि 21वीं सदी में हम चांद और मंगल पर तो पहुंच गए, लेकिन अपने ही गांवों में सांप काटने जैसी सामान्य स्थिति में भी ‘झाड़-फूंक’ के आगे ज़िंदगी हार जाती है।




