छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने जिस हरियाणा सरकार की दुहाई देते हुए राज्य में 14वें मंत्री की नियुक्ति की है। खुद उस हरियाणा सरकार की 14वें मंत्री के नियुक्ति का मसला सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है।
मध्यप्रदेश के कमलनाथ सरकार गिरने का किस्सा तो याद होगा? वहां भी शिवराज सरकार ने सरकार बनाते हुए मंत्रियों की संख्या 34 कर ली थी। ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक गया।
हरियाणा और मध्यप्रदेश दोनों का यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। 2020 से मध्यप्रदेश का और 2024 से हरियाणा का। लेकिन अब तक इन दोनों ही मामले में सुनवाई पूरी नहीं हुई है। खबर है कि इन दोनों ही मामले में सरकार को जवाब तलब किया गया है।
छत्तीसगढ़ का यह मामला देशभर में तीसरा है। रायपुर के समाजसेवी वासुदेव चक्रवर्ती ने पहले ही इस मामले में हाईकोर्ट पहुंच चुके है और अब कांग्रेस के संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने नई याचिका दायर कर 14वें मंत्री को हटाने की मांग की है।
संविधान के अनुच्छेद 164(1A) के तहत, किसी राज्य में मंत्रियों की संख्या विधानसभा सदस्यों की 15% से अधिक नहीं हो सकती। इस हिसाब से हरियाणा और छत्तीसगढ़ में मंत्रियों की संख्या 13 संवैधानिक है। लेकिन दोनों ही जगह संविधान के विपरीत मंत्रियों की संख्या 14 है, जो असंवैधानिक है।
छत्तीसगढ़ और हरियाणा दोनों राज्यों में विधानसभा में कुल 90 सदस्य है। इस हिसाब से 90 विधानसभा सदस्यों का 15% निकाला जाए तो मंत्रियों की संख्या 13.5 होगा। हालांकि इस अनुपात को 13.5 को संसदीय प्रथा में 13 माना जाता है। हरियाणा सरकार ने कोर्ट से जवाब में कहा है कि 0.5 को सुनने की बजाय निहार लिया जाए, आखिर 14 से ज़्यादा नहीं हुए, एक सीमांत उल्लंघन है।
छत्तीसगढ़ में जब दोनों ही याचिकाओं पर सुनवाई चलेगी और कोर्ट जवाब मांगेगा तो छत्तीसगढ़ सरकार भी हरियाणा फ़ॉर्मूले की तर्ज पर अपना जवाब तलब कर सकती है।
हरियाणा और मध्यप्रदेश के मामलों में वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहना दर्शाता है कि संवैधानिक सीमाओं के उल्लंघन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी निर्णय आने में कितना समय लगता है। मध्यप्रदेश का मामला 2020 से और हरियाणा का 2024 से लंबित है। पांच साल तक जजमेंट न आना आम नागरिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं दोनों के लिए असंतोषजनक है। यह न्यायिक प्रक्रियाओं की धीमी गति और मामलों के बोझ का प्रतीक है।
संविधान के अनुच्छेद 164(1A) के तहत मंत्रियों की संख्या विधानसभा में 15% से अधिक नहीं हो सकती। दोनों ही राज्यों में 90 सदस्यों के लिए 13.5 यानी व्यावहारिक रूप से 13 मंत्री संवैधानिक हैं। हरियाणा सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि 14 ministers “सीमांत उल्लंघन” है और इसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। यह तर्क संवैधानिक प्रावधानों की कठोरता और राजनीतिक व्यावहारिकता के बीच टकराव को उजागर करता है।
छत्तीसगढ़ में वासुदेव चक्रवर्ती की पहले ही याचिका लंबित है और अब कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने नया मामला दायर किया है। यह दर्शाता है कि संवैधानिक उल्लंघन के प्रति नागरिक और विपक्ष दोनों सतर्क हैं। नई याचिका न केवल मंत्रियों की संख्या पर सवाल उठाती है बल्कि न्यायपालिका की धीमी प्रतिक्रिया पर भी अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालती है।
जब संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन पर भी फैसले वर्षों तक नहीं आते, तो न्यायपालिका की जवाबदेही पर प्रश्न उठता है। न्यायपालिका लोकतंत्र की चौथी शक्ति है, और उसका धीमा कामकाज संवैधानिक शासन और राजनीतिक स्थिरता दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
छत्तीसगढ़ मामले में, जैसे ही कोर्ट जवाब मांगेगा और सुनवाई होगी, यह केवल 14वें मंत्री की वैधता का सवाल नहीं होगा, बल्कि पूरे देश में न्यायपालिका की गति और संवैधानिक पालन की मजबूती पर भी ध्यान आकर्षित करेगा। सरकारें हरियाणा और मध्यप्रदेश के “फॉर्मूले” का हवाला दे सकती हैं, लेकिन सवाल यही रहेगा कि क्या संवैधानिक सीमाओं के उल्लंघन को तर्कसंगत माना जा सकता है।
छत्तीसगढ़ और हरियाणा में 14वें मंत्री की नियुक्ति का विवाद केवल संवैधानिक सीमा (अनुच्छेद 164(1A)) के उल्लंघन का मामला नहीं है। यह उस राजनीतिक परंपरा का हिस्सा भी है, जो भाजपा और मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद तेज हुई।
केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद कई राज्य सरकारों में मंत्रियों की संख्या बढ़ाने और कैबिनेट विस्तार में “लचीले फॉर्मूले” अपनाने की परंपरा सामने आई। इसका उद्देश्य राजनीतिक संतुलन बनाए रखना और दलगत हितों को संतुष्ट करना है। हरियाणा सरकार ने भी कोर्ट में तर्क दिया कि 14वें मंत्री के आने से संवैधानिक सीमा का मामूली उल्लंघन हुआ है, जिसे व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। यही रणनीति छत्तीसगढ़ में भी अपनाई गई।
मगर सवाल यह है कि क्या संवैधानिक सीमाओं को राजनीतिक तर्क से पीछे छोड़ देना लोकतंत्र और कानून की दृष्टि से उचित है। जब मध्यप्रदेश और हरियाणा के मामले सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लंबित हैं, और अब छत्तीसगढ़ में नई याचिका दायर हुई है, तो यह केवल मंत्री की संख्या का सवाल नहीं रह जाता। यह न्यायपालिका की जवाबदेही, संवैधानिक पालन और राजनीतिक परंपराओं के टकराव का बड़ा संकेत बन जाता है।
संक्षेप में, यह मामला न्यायपालिका की धीमी प्रक्रिया, संवैधानिक सीमाओं के महत्व, और राजनीतिक रणनीतियों के बीच संतुलन का आईना है।




