मनेंद्रगढ़। ‘अमृत धारा महोत्सव’ वैसे तो सांस्कृतिक था, लेकिन असली प्रस्तुति राजनीति ने दे दी। महोत्सव में गाने-बजाने से ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि किसे अंदर जाने दिया गया और किसे नहीं।
कहानी सीधी है, नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिमा यादव और मंत्री के विधायक प्रतिनिधि सूरज यादव कार्यक्रम स्थल पहुंचे। सोचा होगा, स्वागत होगा। लेकिन गेट पर ही रोक लगा दी गई। वजह सुरक्षा नहीं बताई जा रही, प्रोटोकॉल भी नहीं। बल्कि, अंदर की खींचतान बाहर आ गई।
अब असली दृश्य देखिए। अपमान से नाराज़ विधायक प्रतिनिधि सूरज यादव का गुस्सा ऐसा फूटा कि उन्होंने नगर पालिका अध्यक्ष का बोर्ड उखाड़कर सड़क पर फेंक दिया।
महोत्सव का मंच अंदर सजा था, लेकिन बाहर राजनीति का सेटअप ज्यादा जीवंत दिखा।

फिर बयान आया – “मंच पर हमारे नाम की जरूरत नहीं… आज यहां हैं, कल चले जाएंगे।”
सियासत में यह संवाद आमतौर पर विरोधी देते हैं। यहां अपने ही मंच से पहले तल्खी बाहर आ गई और महोत्सव में आए लोग इस घटना का मेला लूटते रहे।
सोचिए, जिस पार्टी ने अनुशासन को अपनी पहचान बताया, उसके कार्यक्रम में एंट्री ही विवाद बन जाए तो संदेश क्या जाता है? अगर मंच पर जगह तय करने में इतनी खींचतान है, तो ज़मीनी राजनीति कितनी सहज होगी। यह सवाल खुद उठ खड़ा हुआ है।
राजनीतिक जानकार इसे छोटी तकरार नहीं मान रहे। उनका कहना है कि यह गुटबाजी का संकेत है। अगर समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो ऐसे “महोत्सव” आगे भी सुर्खियां बटोरते रहेंगे।




