रायपुर। बस्तर का हरा सोना कहलाने वाला तेंदू पत्ता एक अहम वन उत्पाद है. जो बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों के लिए न केवल रोजगार का बड़ा स्रोत है. बल्कि नक्सलियों के लिए भी एक प्रमुख आर्थिक स्रोत रहा है. हर साल तेंदू पत्ते की खरीदी की प्रक्रिया में टेंडर जारी किए जाते थे और ठेकेदार इन पत्तों की खरीदारी करते थे. लेकिन इस बार 2025 के नए नियमों के तहत सरकार ने तेंदू पत्ता की खरीदी की पूरी जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली है. वन विभाग ने इस प्रक्रिया के लिए पूरी तैयारी कर ली है और सरकार की यह पहल नक्सलवाद को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है…
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नक्सलवाद के कारण बस्तर में कई वर्षों से अशांति रही है और तेंदू पत्ते का एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों के आय के स्रोतों में शामिल था. जो नक्सली लेवी के रूप में ठेकेदारों से वसूलते थे. बस्तर में नक्सलियों के लिए तेंदू पत्ता एक महत्वपूर्ण वित्तीय स्रोत था जिससे वे अपनी गतिविधियों को फंडिंग करते थे. इस पर नियंत्रण पाने के बाद, सरकार का उद्देश्य न केवल नक्सलियों की आर्थिक मदद को कम करना है. बल्कि उनके नेटवर्क को कमजोर करना है. सरकार की इस पहल के पीछे एक बड़ा उद्देश्य नजर आ रहा है. नक्सलवाद पर लगाम लगाना पुलिस के एंटी नक्सल ऑपरेशंस और आत्मसमर्पण नीति के माध्यम से सरकार नक्सलियों के खिलाफ अभियान चला रही है. जब सरकार खुद तेंदू पत्ता की खरीदारी करेगी, तो यह बिचौलियों और नक्सलियों को आर्थिक रूप से कमजोर करेगा जिससे उनका प्रभाव क्षेत्र कम होगा।
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इसके अतिरिक्त सरकार का यह कदम आदिवासी समुदाय के लिए भी फायदेमंद होगा क्योंकि अब तेंदू पत्ता का व्यापार पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में होगा और आदिवासियों को अपनी मेहनत का सही मूल्य मिलेगा बिना किसी बिचौलिये के हस्तक्षेप के इससे उन्हें उचित मूल्य पर अपनी उपज बेचने का मौका मिलेगा और उनके जीवन स्तर में सुधार हो सकता है. सरकार का यह निर्णय बस्तर में नक्सलवाद की समस्या को हल करने, आदिवासी समुदाय के हितों की रक्षा करने और वन संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है. अगर यह प्रक्रिया सफल रहती है तो बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ एक निर्णायक जीत हो सकती है और वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी सुधार आ सकता है।




