रायपुर। भारतीय जनता पार्टी की सरकार छत्तीसगढ़ में “सुशासन” का ढोल पीट रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि प्रदेश के 7 लाख अनियमित कर्मचारी खुद को ठगा हुआ, शोषित और हाशिए पर धकेला हुआ महसूस कर रहे हैं। अनियमित कर्मचारियों ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ में मोदी की गारंटी पूरी तरह विफल हो चुकी है।
अनियमित कर्मचारी नेता गोपाल प्रसाद साहू ने कहा कि सरकार की नीतियां गरीब-मजदूर नहीं, बल्कि सिर्फ़ नियमित अफसरशाही के लिए बनाई जा रही हैं। संविदा, दैनिक वेतनभोगी, मानदेय, अंशकालीन, आउटसोर्सिंग, ठेका और सेवा प्रदाता के माध्यम से कार्यरत कर्मचारी वही काम कर रहे हैं, जो नियमित कर्मचारी करते हैं, लेकिन उन्हें आधे से भी कम वेतन दिया जा रहा है।
8 साल का सन्नाटा, सरकार की चुप्पी
प्रदेश के श्रम विभाग ने 2017 के बाद एक बार भी न्यूनतम वेतन संशोधित नहीं किया। वित्त विभाग ने ढाई वर्षों से संविदा वेतन में वृद्धि नहीं की। दूसरी ओर नियमित कर्मचारियों के वेतन और महंगाई भत्ते में लगातार इज़ाफा किया जा रहा है। यह सीधा-सीधा राज्य प्रायोजित भेदभाव है।
सरकार के भरोसे, चुनावी हथकंडे
चुनाव के समय भाजपा के बड़े-बड़े नेता अनियमित कर्मचारियों के मंच पर पहुंचे, माइक पकड़ा, फोटो खिंचवाई और आश्वासन दिए। सरकार बनी, कुर्सी मिली और वही कर्मचारी भुला दिए गए। कर्मचारियों का आरोप है कि भाजपा ने अनियमित कर्मचारियों को सिर्फ़ वोट बैंक समझा।
मोदी की गारंटी: कागज़ों की स्कीम
मोदी की गारंटी 2023 में “वचनबद्ध सुशासन” के नाम पर अनियमित कर्मचारियों के लिए समिति गठन का वादा किया गया। लेकिन बनी समिति में अनियमित कर्मचारियों का एक भी प्रतिनिधि नहीं। कर्मचारियों ने इसे जानबूझकर किया गया छल बताया है।
मुख्यमंत्री की घोषणा भी जुमला
लोकसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ने समिति गठन की घोषणा की, लेकिन आज तक कोई आदेश नहीं, कोई बैठक नहीं, कोई जवाब नहीं। भाजपा सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन अनियमित कर्मचारियों के हिस्से में सिर्फ़ तारीखें और भाषण आए हैं।
27% वेतन वृद्धि सिर्फ पोस्टर तक
जुलाई 2023 में घोषित 27 प्रतिशत संविदा वेतन वृद्धि और श्रम सम्मान राशि ज़मीनी स्तर पर अधिकांश कर्मचारियों को नहीं मिली। कई विभागों में महीनों से वेतन अटका हुआ है और कई जगह वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों को चुपचाप बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
आधुनिक गुलामी का आरोप
अनियमित कर्मचारियों का कहना है कि उनकी स्थिति अब मध्यकालीन बंधुआ मजदूरों से भी बदतर हो चुकी है। परिवार, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोज़मर्रा की ज़रूरतों के बीच कर्मचारी प्रशासनिक दबाव में चुप रहने को मजबूर हैं।
सीधी मांग, सीधा सवाल
कर्मचारियों ने सरकार से पूछा है —
अगर यही “सुशासित छत्तीसगढ़” है,
अगर यही “मोदी की गारंटी” है,
तो फिर 7 लाख कर्मचारियों के साथ यह अन्याय क्यों?
अनियमित कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द न्यूनतम वेतन पुनरीक्षण, संविदा वेतन वृद्धि, नियमितीकरण, छंटनी रोकने और आउटसोर्सिंग व्यवस्था समाप्त करने पर ठोस निर्णय नहीं लिया, तो आंदोलन को और तेज़ किया जाएगा।
अब सवाल सिर्फ वेतन का नहीं, भरोसे का है — और यह भरोसा छत्तीसगढ़ में टूट चुका है।




