धमतरी। जिले के दुगली थाना क्षेत्र के गुहाननाला गांव में जो हुआ, वह सिर्फ एक गांव का विवाद नहीं है। यह उस समाज की तस्वीर है, जो आज भी मृत्यु के बाद भी इंसान को चैन से विदा नहीं होने देता।
80 वर्षीय तितरो बाई का 3 फरवरी को निधन हुआ। एक वृद्ध महिला, जिसने जीवन के आठ दशक देखे। लेकिन मृत्यु के बाद भी उन्हें शांति नहीं मिली। आरोप है कि परिजनों ने उनका शव बिना गांव की सहमति के दफना दिया। वजह? परिवार ने आठ साल पहले ईसाई धर्म अपना लिया था।
यहीं से सवाल शुरू होता है
ग्रामीणों को जब दफनाने की जानकारी मिली, तो विरोध भड़क उठा। शव को उखाड़ने की मांग की गई। थाने में शिकायत दर्ज हुई। तीन घंटे तक गांव में तनाव, बहस, आक्रोश। पुलिस और डीआरजी को तैनात करना पड़ा। आखिरकार मामला तब शांत हुआ, जब परिजनों ने लिखित में यह आश्वासन दिया कि वे “पुनः अपने मूल धर्म में लौट आए हैं।”
यानी एक मृत देह की शांति की कीमत – धर्म वापसी का लिखित बयान?
यह खबर सिर्फ कानून-व्यवस्था की नहीं है। यह समाज की मानसिकता पर सीधा सवाल है।
- पहला सवाल: क्या किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसकी आस्था पर सामूहिक नियंत्रण होना चाहिए?
- दूसरा सवाल: क्या गांव की सहमति इंसान की अंतिम विदाई से बड़ी हो सकती है?
- और सबसे बड़ा सवाल: क्या हम अभी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं?
भारतीय संविधान हर नागरिक को अपनी आस्था चुनने और बदलने का अधिकार देता है। यह अधिकार जीवन तक सीमित नहीं, बल्कि उसकी गरिमा तक जुड़ा है। मृत्यु के बाद भी सम्मान, यह किसी भी सभ्य समाज की बुनियादी पहचान होती है।
लेकिन गुहाननाला में जो हुआ, उसमें कानून से ज्यादा भीड़ की मानसिकता प्रभावी दिखी। तीन घंटे तक एक मृत महिला के नाम पर तनाव बना रहा। अंत में शांति आई, पर किस कीमत पर?
यह घटना हमें आईना दिखाती है
हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, चंद्रयान की सफलता पर गर्व करते हैं, लेकिन गांवों में आज भी धर्म के नाम पर अंतिम संस्कार विवाद का कारण बन जाता है।
यहां प्रशासन ने हालात संभाले, यह सकारात्मक है। लेकिन समाज कब संभलेगा?
मृत्यु के बाद व्यक्ति की पहचान क्या होती है? धर्म? समुदाय? या सिर्फ एक इंसान?
तितरो बाई अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी अंतिम विदाई का विवाद हमारे सामने एक असहज सच्चाई छोड़ गया है—हम अभी भी सहिष्णुता की परीक्षा में फेल हो रहे हैं।
अब सवाल गांव से बड़ा है।
सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे समाज बन पाए हैं, जहां इंसान की आखिरी यात्रा भी बिना डर, दबाव और शर्तों के पूरी हो सके?




