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    Home » पेसा पर अब आंसू बहा रहे टीएस बाबा… वही कानून, जिसकी ड्राफ्टिंग पर कभी आदिवासी संगठनों ने उठाए थे सवाल

    पेसा पर अब आंसू बहा रहे टीएस बाबा… वही कानून, जिसकी ड्राफ्टिंग पर कभी आदिवासी संगठनों ने उठाए थे सवाल

    Shrikant BaghmareBy Shrikant BaghmareMay 26, 2026 राजनीति No Comments3 Mins Read

    कोरबा। पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने हसदेव क्षेत्र के बुका में आयोजित महासम्मेलन में मौजूदा सरकार पर पेसा कानून को प्रभावी ढंग से लागू नहीं करने का आरोप लगाया। मंच से उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने आदिवासी क्षेत्रों में अधिकार आधारित शासन व्यवस्था स्थापित करने के लिए पेसा कानून को प्राथमिकता दी थी, लेकिन सत्ता बदलते ही वह सोच भी बदल गई।

    सिंहदेव ने दावा किया कि कांग्रेस सरकार ने ग्राम सभाओं को मजबूत करने, गांव के तालाबों और स्थानीय संसाधनों पर पहला अधिकार ग्रामीणों को देने, तथा मछली पालन जैसे अधिकार स्थानीय लोगों को सौंपने के लिए विशेष प्रावधान किए थे। उन्होंने जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकार की बात दोहराते हुए कहा कि विस्थापन की स्थिति में मुआवजा और वैकल्पिक रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है।

    लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस पेसा कानून को लेकर आज कांग्रेस खुद को आदिवासी अधिकारों का सबसे बड़ा प्रहरी बता रही है, उसी कानून की ड्राफ्टिंग के समय सबसे ज्यादा विवाद भी खड़े हुए थे।

    भूपेश सरकार ने 2022 में पेसा नियम लागू किए थे और दावा किया था कि इससे आदिवासी इलाकों में ग्राम सभाओं को ऐतिहासिक अधिकार मिलेंगे। ड्राफ्ट में ग्राम सभा को जल, जंगल, जमीन, लघु वनोपज, स्थानीय संसाधनों, भूमि अधिग्रहण और खनन गतिविधियों पर सलाह और सहमति का अधिकार देने की बात कही गई थी। सरकार इसे “आदिवासी स्वशासन का मॉडल” बता रही थी।

    लेकिन उसी समय कई आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस ड्राफ्ट का खुलकर विरोध किया था। आरोप लगाया गया था कि कानून में ग्राम सभा को अधिकार देने का दावा तो किया गया, लेकिन अंतिम नियंत्रण अफसरशाही और प्रशासन के पास ही रखा गया। कई संगठनों ने कहा था कि ग्राम सभा की सहमति को निर्णायक बनाने के बजाय उसे केवल औपचारिक प्रक्रिया बनाकर छोड़ दिया गया।

    खनन, जमीन अधिग्रहण और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को लेकर भी विरोध हुआ था। आदिवासी संगठनों का कहना था कि अगर सच में पेसा लागू करना था तो ग्राम सभा को अंतिम फैसला लेने की ताकत दी जाती, लेकिन ड्राफ्ट में “सरकारी मंजूरी” की दीवार हर जगह खड़ी कर दी गई।

    उस वक्त विपक्ष में बैठी बीजेपी ने कांग्रेस पर “चुनावी पेसा” लाने का आरोप लगाया था, जबकि कई आदिवासी संगठनों ने इसे “कागजी स्वशासन” बताया था। अब सत्ता बदल चुकी है और वही कांग्रेस पेसा को लेकर सरकार पर सवाल उठा रही है।

    यानी छत्तीसगढ़ की राजनीति में पेसा कानून भी शायद जल, जंगल और जमीन की तरह सत्ता के हिसाब से अपना रंग बदलता नजर आ रहा है। जब सरकार में थे तो “ऐतिहासिक कानून” था, अब विपक्ष में हैं तो “भूला हुआ अधिकार” बन गया है।

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