Rashtriya Swayamsevak Sangh : संघ के सर संचालक मोहन भागवत का बयान सामने आया है। गौर करने वाली बात यह है कि उन्होंने यह बयान ऐसे वक्त में दिया है, जब नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है और मंत्रालय का भी बंटवारा हो चुका है। ऐसे में उनके द्वारा दिए गए बयान की टाइमिंग ने सियासी हलचल तेज कर दी है। इसके अलावा, उन्होंने अपने बयान में जिन विषयों का चयन किया है, वो भी बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे।
Rashtriya Swayamsevak Sangh : दरअसल, मोहन भागवत ने कहा, “चुनाव सहमति बनाने की प्रक्रिया है। सहचित्त संसद में किसी भी प्रश्न के दोनों पहलू सामने आए इसलिए ऐसी व्यवस्था है। चुनाव प्रचार में जिस प्रकार एक-दूसरे को लताड़ना, तकनीकी का दुरुपयोग, असत्य प्रसारित करना ठीक नहीं है।“ राजनीतिक जगत में मोहन भागवत के इस बयान को सत्तापक्ष के लिए नसीहत के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। इसके अलावा, वो विपक्ष पर भी जोर देते हुए दिख रहे हैं। उन्होंने अपने पोस्ट में कहा कि ‘विरोधी’ की जगह ‘प्रतिपक्ष’ होना चाहिए। उनके बयान से यह साफ जाहिर होता है कि वो ऐसा कहकर विपक्ष का पक्ष ले रहे हैं।
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Rashtriya Swayamsevak Sangh : इसके साथ ही उन्होंने मणिपुर हिंसा पर भी अपनी बात रखी। मणिपुर में अभी भी हिंसा की आग रह रहकर सुलग जा रही है। शांति स्थापित करने की दिशा में ढेर सारे कदम उठाए गए लेकिन अभी तक इस हिंसा के दबने और इन कदमों के कोई सकारात्मक नतीजे सामने नहीं आए हैं। उन्होंने मणिपुर हिंसा पर कहा, “एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। इससे पहले 10 साल शांत रहा। पुराना गन कल्चर समाप्त हो गया ऐसा लगा और अचानक जो कलह वहां पर उपजा या उपजाया गया, उसकी आग में अभी तक जल रहा है, त्राहि-त्राहि कर रहा है। इस पर कौन ध्यान देगा? प्राथमिकता देकर उसका विचार करना यह कर्तव्य है।“ मोहन भागवत के इस बयान को केंद्र की मोदी सरकार के लिए नसीहत के रूप में रेखांकित किया जा रहा है।
मुखपत्र में तीखी टिप्पणी
लोकसभा चुनावों के नतीजों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की तीखी टिप्पणी सामने आई है। आरएसएस ने कहा है कि लोकसभा चुनाव के ये नतीजे बीजेपी के अतिउत्साहित कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए रियलिटी चेक है, जो अपनी ही दुनिया में मग्न थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की चकाचौंध में डूबे हुए थे। इस तरह इन तक आमजन की आवाज नहीं पहुंच पा रही थी।
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आरएसएस ने अपने माउथपीस Organiser के ताजा अंक में ये टिप्पणी की है। माउथपीस के लेख में कहा गया है कि आरएसएस, बीजेपी की ‘फील्ड फोर्स’ नहीं है। इन चुनावी नतीजों से स्पष्ट है कि ऐसे अनुभवी स्वयंसेवकों को भी नजरअंदाज किया गया, जिन्होंने सोशल मीडिया के इस दौर में फेम की लालसा के बिना अथक परिश्रम किया है। आरएसएस के सदस्य रतन शारदा ने इस आलेख में कहा है कि 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के अतिउत्साही कार्यकर्ताओं और कई नेताओं के लिए रियलिटी चेक की तरह आए हैं। इन्हें अहसास ही नहीं था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 400 पार का नारा उनके लिए लक्ष्य और विपक्ष के लिए चुनौती थी।




