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    Home » तीजा-पोला की रौनक: बाजारों में उमड़ी भीड़, भाई भी विवाहित बहनों को लेने पहुँचने लगे

    तीजा-पोला की रौनक: बाजारों में उमड़ी भीड़, भाई भी विवाहित बहनों को लेने पहुँचने लगे

    Shrikant BaghmareBy Shrikant BaghmareAugust 20, 2025 धर्म एवं समाज No Comments3 Mins Read

    रायपुर। छत्तीसगढ़ की संस्कृति अपनी सरलता और लोक परंपराओं के लिए जानी जाती है। यहाँ साल भर अलग-अलग पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन सावन-भादो के महीने में तीजा और पोला का विशेष महत्व होता है। ये त्यौहार सिर्फ धार्मिक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकजुटता, पारिवारिक रिश्तों और कृषि परंपरा का प्रतीक भी हैं।

    तीजा-पोला पर्व नज़दीक आते ही राजधानी समेत पूरे प्रदेश के बाजारों में रौनक साफ दिखाई देने लगी है। कपड़ों की दुकानों, चूड़ी-झुमके के साथ बालकों के लिए मिटटी के बैल और बालिकाओं के लिए घरों में इस्तेमाल होने वाले कडाही बर्तन और जाता की दुकानों पर खरीददारों की भीड़ लगातार बढ़ रही है।

    महिलाएँ तीजा के उपवास और पूजा के लिए नए कपड़े और श्रृंगार सामग्री की जमकर खरीदारी कर रही हैं। सजधजकर तीजा मनाने का उत्साह इस बार कुछ खास है। मेहंदी की दुकानों पर लड़कियों और महिलाओं की कतारें लगी हैं। वहीं, ग्रामीण इलाकों से आई महिलाएँ भी शहर के हाट-बाजारों में खरीदारी में जुटी हैं।

    इसी बीच, तीजा की परंपरा के अनुसार भाई अपनी बहनों को ससुराल से लाने के लिए निकल पड़े हैं। गांव-गांव से लेकर शहर तक तीजा की तैयारी और भाई-बहन के मिलन का यह अनोखा दृश्य देखने को मिल रहा है।

    तीजा – बहनों का मायके से जुड़ाव

    तीजा पर्व विवाहित महिलाओं का खास त्योहार है। इस दिन वे भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

    तीजा का सबसे भावुक पल होता है – भाई का अपनी बहन को ससुराल से मायके लाना। बहनें मायके आकर सजधज कर लोकगीत गाती हैं, नाचती-गाती हैं और अपनी सहेलियों व परिजनों संग खुशियाँ बांटती हैं।

    व्रत रखने से पहले ख़ास परंपरा भी खास है। महिलाएँ दिनभर का उपवास रखने से पहले करु-भात खाकर निर्जल व्रत रखती हैं,  वहीं इडहर की कढ़ी और चावल से तीजा का उपवास खोलती हैं। यही छत्तीसगढ़ी तीजा की पहचान मानी जाती है।

    मायके से बेटियों को साड़ी, चूड़ी, सिंदूर और ठेठरी और खुर्मी जैसे पकवान भेजने की भी परंपरा है, जो रिश्तों की मिठास और अपनापन बढ़ाती है।

    पोला – बैलों का त्योहार

    पोला किसानों और बैलों का उत्सव है। खेती-किसानी में बैल को परिवार का हिस्सा माना जाता है। इस दिन बैलों को नहलाकर, सजाकर, उनकी पूजा की जाती है। बच्चे मिट्टी या लकड़ी के छोटे-छोटे बैल (नंदिया-भकुरा) लेकर खेलते हैं। यह पर्व किसान और उसके खेतिहर साथी बैलों के बीच गहरे रिश्ते का प्रतीक है।

    सांस्कृतिक महत्व

    जहाँ तीजा बहन-भाई के रिश्ते और स्त्री-शक्ति का प्रतीक है, वहीं पोला खेती-किसानी और प्रकृति के प्रति आभार का पर्व है। दोनों त्योहार मिलकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को और गहरा बनाते हैं।

     

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