गढ़फुलझर… नाम लेते ही आंखों के सामने इतिहास की परतें खुलने लगती हैं। कभी भयना राजवंश का गढ़ रहा यह इलाका आज खंडहरों में तब्दील हो चुका है, लेकिन हर ईंट, हर पत्थर अब भी उस स्वर्णिम युग की गवाही देता है जब यहां राजदरबार की गूंज सुनाई देती थी।
अधिवक्ता एवं समाजसेवी टिकेंद्र प्रधान बताते है कि गढ़ के भग्नावशेष, रानीसागर तालाब, खंभेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर, मंझला राजा की स्मृतियां और छिन्नमस्ता देवी की पूजा से जुड़ी तांत्रिक परंपराएं सब कुछ रहस्य और रोमांच से भरा है। स्थानीय बैगा और पुजारी आज भी विशेष तंत्र विधियों से देवी की आराधना करते हैं, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का जिंदा प्रमाण है।

फुलझर जमींदारी का विस्तार बसना, सरायपाली से लेकर पिथोरा तहसील और जोंक नदी तक फैला हुआ था। 1905 से पहले यह संबलपुर जिला के अधीन और बंगाल प्रांत का हिस्सा हुआ करता था। उस दौर में बंगाल प्रांत में उड़ीसा, बिहार, बंगाल और असम तक शामिल थे। बंगाल विभाजन (1905) के बाद फुलझर जमींदारी सेंट्रल प्रॉविंस के अधीन आई, जिसका मुख्यालय नागपुर था।
1 अप्रैल 1936 को उड़ीसा राज्य गठन के साथ संबलपुर जिला तो ओडिशा में शामिल हुआ, लेकिन फुलझर जमींदारी क्षेत्र- बसना, सरायपाली, पिथोरा, रायपुर जिला का हिस्सा बना रहा। इसीलिए यहां ओड़िया भाषी जनसंख्या अधिक है, पर सांस्कृतिक रूप से यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ से गहराई से जुड़ा है।
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यही कारण है कि फुलझर जमींदारी के लोगों को ओड़िया भाषी कहकर ‘परदेशी’ समझना अज्ञानता है। यह धरती ऐतिहासिक रूप से छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोकसंस्कारों से रची-बसी है। श्री टिकेंद्र प्रधान कहते है कि हम परदेशिया नहीं है। हम पीढ़ियों से जहां थे, वहीं है। हमारा क्षेत्र अलग-अलग प्रांतों के हिस्सा बना।

आज गढ़फुलझर में स्थित रामचंडी मंदिर नई आस्था का केंद्र बन चुका है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां विशाल मेला लगता है, जहां हजारों श्रद्धालु उमड़ते हैं। भक्ति, लोकनृत्य और पारंपरिक अनुष्ठानों से पूरा इलाका जीवंत हो उठता है।
स्थानीय शिक्षक श्री दुर्गा प्रसाद साहू ने श्री टिकेंद्र प्रधान को बताया कि भयना राजवंश के पतन के बाद उसके वंशज मल्हार (बिलासपुर) चले गए थे। आज भी वे प्रतिवर्ष 26 मई को मंझला राजा के जन्मदिवस पर गढ़फुलझर लौटते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। साहू जी ने यह भी जानकारी दी कि भयना राजवंश का विस्तृत इतिहास पाटनगढ़ (ओडिशा) कॉलेज की लाइब्रेरी में सुरक्षित है, जिसे इतिहासकार डॉ. शिवतोष दास ने लिखा है।
किले की दीवारों, मंदिरों और तालाबों को देखकर यह साफ महसूस हुआ यह सिर्फ एक पुराना किला नहीं, बल्कि एक जीवित इतिहास है जो अब भी अपनी कहानी कह रहा है। गढ़फुलझर का हर पत्थर कहता है — हम कभी राजाओं का गढ़ थे।




