नई दिल्ली। राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने की समयसीमा तय करने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत किसी भी स्थिति में राज्यपाल या राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका को सीमित नहीं कर सकती।
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति को जो लचीलापन दिया गया है, वह संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और न्यायालय द्वारा उस पर किसी प्रकार की समय-सीमा थोपना शक्तियों के पृथक्करण के खिलाफ होगा।
राज्यपाल के तीन ही विकल्प, चौथा कोई रास्ता नहीं
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 200 राज्यपाल को केवल तीन विकल्प देता है—विधेयक पर सहमति देना, उसे रोककर वापस करना या राष्ट्रपति के पास भेजना। अदालत ने कहा कि इसके अलावा राज्यपाल के लिए कोई “चौथा विकल्प” अस्तित्व में नहीं है।
हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चय की स्थिति में लंबित नहीं रख सकते, लेकिन इस स्थिति में भी कोर्ट समय-सीमा तय नहीं कर सकता, क्योंकि यह कार्यपालिका की भूमिका में दखल माना जाएगा।
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तमिलनाडु के फैसले पर कड़ी टिप्पणी
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में तमिलनाडु के 10 विधेयकों की “मान्य स्वीकृति” देने संबंधी दो जजों की पीठ के निर्देश को भी असंवैधानिक करार दिया। पीठ ने कहा कि न्यायालय किसी भी संवैधानिक प्राधिकारी की शक्तियों का अधिग्रहण नहीं कर सकता और न ही अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए खुद को राज्यपाल की भूमिका में स्थापित कर सकता है। सीजेआई ने कहा, मान्य स्वीकृति की अवधारणा संविधान की भावना और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत से मेल नहीं खाती।
समय-सीमा लगाना संविधान की संरचना के विपरीत
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि विधेयकों पर निर्णय के लिए समय-सीमा निर्धारित करना संविधान द्वारा संरक्षित लचीलेपन को नष्ट कर देगा। उन्होंने कहा कि यह मानना भी गलत होगा कि न्यायालय किसी अन्य संवैधानिक पदाधिकारी की जगह खड़ा हो सकता है।
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न्यायिक समीक्षा कब संभव?
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों पर की गई कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा केवल तभी संभव है जब वह विधेयक कानून बन चुका हो। पीठ ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति को हर विधेयक पर न्यायालय से मार्गदर्शन लेने की बाध्यता नहीं है। यदि आवश्यकता हो तो अनुच्छेद 143 के तहत सलाहकार राय का विकल्प हमेशा खुला है।




