नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। बुधवार शाम एक डॉलर की कीमत 90.19 रुपए दर्ज की गई, जो पिछले साल 3 दिसंबर के 84.68 रुपए की तुलना में करीब 6 रुपए अधिक है। इस गिरावट का सीधा असर विदेश में पढ़ रहे भारतीय छात्रों के अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है।
अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को विदेश भेजा जाने वाला पैसा अब पिछले साल की तुलना में 7-8 प्रतिशत तक महंगा हो गया है। वर्तमान में 7.5 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं और उन्हें नियमित रूप से भारत से धनराशि भेजी जाती है। इसके अलावा विदेश यात्रा भी अब पहले से काफी महंगी हो गई है क्योंकि डॉलर या यूरो खरीदने के लिए अधिक रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रुपए में गिरावट का यह सिलसिला जारी रहा तो इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। मोबाइल फोन सहित अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक सामान के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कंपोनेंट अभी भी आयात किए जाते हैं। रुपए की कमजोरी से आयात लागत बढ़ने के कारण उत्पादन खर्च में वृद्धि होगी जिसे निर्माता कंपनियां एक सीमा के बाद उपभोक्ताओं पर ही डालेंगी।
रुपये में लगातार कमजोरी के बीच शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों की निकासी भी बढ़ी है। विशेषज्ञ रुपए की इस गिरावट के लिए वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी को मुख्य कारण बता रहे हैं। उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता होते ही रुपए में मजबूती लौट सकती है। गौरतलब है कि पिछले एक साल में एशियाई मुद्राओं में डॉलर के मुकाबले सबसे ज्यादा गिरावट भारतीय रुपए में ही दर्ज की गई है।
हालांकि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने बुधवार को कहा कि रुपए में गिरावट से भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इससे न तो निर्यात प्रभावित हो रहा है और न ही महंगाई में कोई खास इजाफा हो रहा है।




