बिलासपुर। महानदी में अवैध माइनिंग के बाद पत्थर और माइनिंग वेस्ट डाले जाने के मामले को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गंभीरता से लिया है। चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने साफ शब्दों में कहा है कि तय लीज क्षेत्र से बाहर किसी भी प्रकार की गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मामला रायपुर जिले की आरंग तहसील के ग्राम निस्दा से जुड़ा है, जहां फ्लैगस्टोन, फरसीस्टोन और लाइम स्टोन के उत्खनन में लीज से अधिक क्षेत्र में खनन किए जाने का आरोप है। कोर्ट ने लीज होल्डरों को आदेश दिया है कि वे स्वीकृत क्षेत्र के बाहर किसी भी प्रकार का कार्य तत्काल रोकें।
पांच गुना ज्यादा क्षेत्र में खनन
जांच रिपोर्ट में कलेक्टर ने बताया कि खनन कार्य स्वीकृत लीज एरिया से लगभग पांच गुना अधिक क्षेत्र में किया जा रहा था। रायपुर डिवीजन के डिप्टी कमिश्नर और गवर्नर सचिवालय से प्राप्त पत्रों में भी इन आरोपों की पुष्टि हुई है।
मामला भारत सरकार के खनन मंत्रालय तक पहुंचा, जिसके बाद राज्य के अधिकारियों को एमएमडीआर एक्ट, 1957 के तहत जांच के निर्देश दिए गए।
400 एकड़ खेती पर असर
सबसे गंभीर पहलू यह है कि महानदी में माइनिंग वेस्ट डाले जाने से लगभग 400 एकड़ कृषि भूमि प्रभावित हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे फसलों को भारी नुकसान हुआ है और पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ा है।
यह भी सामने आया है कि संबंधित लीज होल्डरों की पर्यावरणीय स्वीकृति पिछले तीन वर्षों से समाप्त हो चुकी है, फिर भी खनन गतिविधियां जारी रहीं।
सचिव से मांगा व्यक्तिगत जवाब
हाईकोर्ट ने माइंस एंड मिनरल्स रिसोर्स डिपार्टमेंट के सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा पेश कर जवाब देने का निर्देश दिया है। साथ ही रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल को आदेश की प्रति तत्काल माइनिंग सचिव को भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
अगली सुनवाई 26 फरवरी को निर्धारित की गई है।
बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ अवैध खनन का नहीं है। सवाल यह है कि स्वीकृति खत्म होने के बावजूद गतिविधियां कैसे चलती रहीं? निगरानी तंत्र कहां था? और महानदी जैसी प्रमुख नदी में माइनिंग वेस्ट डालने की अनुमति किसने दी?
हाईकोर्ट की सख्ती ने साफ संकेत दे दिया है, अब जवाबदेही तय होगी। 26 फरवरी की सुनवाई इस मामले की दिशा तय कर सकती है।




