रायपुर। राजधानी की उमस भरी दोपहर। नया रायपुर के एक निजी रिसॉर्ट में शुक्रवार को साढ़े तीन घंटे तक चली मैराथन बैठक खत्म हुई तो बाहर निकलते अफसरों के चेहरों पर गंभीरता साफ झलक रही थी। कमरे के भीतर चर्चा थी— जंगलों में फैले नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने की। और बाहर सवाल वही, जो सालों से लोगों के मन में गूंजता रहा है— क्या वाकई नक्सलवाद खत्म हो पाएगा?
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तय तारीख सुना दी है: 31 मार्च 2026। यानी 6 माह के भीतर सरकार देश से नक्सलवाद का नामोनिशान मिटा देने का दावा कर रही है।
रणनीति: बड़ी मछलियों पर फोकस
बैठक में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना के डीजीपी के साथ CRPF, BSF, ITBP, IB और NIA के शीर्ष अधिकारी मौजूद थे। तय हुआ कि अब लड़ाई सीधे “सिर कटाने” की होगी— छोटे कैडरों पर नहीं, बल्कि बड़े लीडर्स को टारगेट किया जाएगा। एनकाउंटर के दौरान सीमा पर घेराबंदी होगी, ताकि नक्सली किसी भी तरफ भाग न सकें।
AI तकनीक से सजी नई जंग
अबकी बार ऑपरेशन की रीढ़ होगी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)। ड्रोन, सैटेलाइट इमेजिंग और डिजिटल सर्विलांस से नक्सलियों की हर हलचल पर नजर रखी जाएगी। जंगल के अंधेरे कोनों में बने ठिकानों को ट्रैक करने के लिए सेंसर और AI-बेस्ड डेटा एनालिसिस का सहारा लिया जाएगा। अधिकारी मानते हैं कि जहां अब तक नक्सली आसानी से छिप जाते थे, वहां भी तकनीक उनका पीछा छोड़ेगी नहीं।
सवाल: क्या 6 माह में सफाया संभव?
मिशन जितना महत्वाकांक्षी है, उतना ही मुश्किल भी। नक्सलवाद कोई कल की समस्या नहीं, यह दशकों पुरानी जड़ें जमा चुका नेटवर्क है। पहले भी कई सरकारें इसके “अंत” की समयसीमा तय कर चुकी हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि तकनीक और संयुक्त ऑपरेशन से बढ़त मिल सकती है, लेकिन पूरी सफाई के लिए 6 माह बहुत कम समय है।
ग्राउंड की हकीकत
बस्तर और अबुझमाड़ के जंगलों में आज भी सड़क, स्कूल और अस्पताल की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। गांवों में लोग कहते हैं— “नक्सलियों से ज्यादा डर भूख और बेरोजगारी का है।” कई जगह बच्चे अब भी पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं क्योंकि रास्ते सुरक्षित नहीं हैं। सवाल यह भी है कि क्या बंदूक के बल पर शांति लाना संभव है, या इसके लिए विकास का भरोसा जरूरी है।
43 मोस्ट वांटेड की सूची
इस बीच सुरक्षा एजेंसियों ने 43 मोस्ट वांटेड नक्सलियों की सूची जारी की है। सबसे बड़ा नाम हिड़मा का है— बस्तर के सबसे खूंखार हमलों का मास्टरमाइंड। उसके साथ—
- सुक्का – अबुझमाड़ का प्रभारी कमांडर
- गंगा – छत्तीसगढ़-ओडिशा सीमा का जिम्मेदार
- सोनू और भीमा – ITBP और CRPF कैंप पर हमलों के आरोपी
- माधवी और रेखा – महिला विंग की ताकतवर नेता
- देवा, रामसाय और जग्गू – मध्य भारत के नक्सली नेटवर्क को चलाने वाले
इन पर करोड़ों रुपये का इनाम है और फोर्स का अगला टारगेट यही नाम हैं।
सरकार का दावा है कि मार्च 2026 तक नक्सलवाद इतिहास बन जाएगा। रणनीति सख्त है, तकनीक आधुनिक है और फोर्स पहले से ज्यादा समन्वित। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि बस्तर और झारखंड के जंगलों में रहने वाला आदमी कब अपने बच्चों को स्कूल भेजते वक्त निडर महसूस करेगा। क्योंकि नक्सलवाद का खात्मा सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि लोगों के दिलों से डर मिटाने से होगा।




