सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी SBI के उस आवेदन को ख़ारिज कर दिया, जिसमें उसने इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी जानकारी देने का समय बढ़ाने की मांग की थी.
इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी को सार्वजनिक करने के लिए एसबीआई ने 30 जून तक का समय बढ़ाने की मांग की थी.
कोर्ट ने आदेश में कहा है कि एसबीआई को 12 मार्च तक 2024 तक जानकारी देनी होगी और चुनाव आयोग को यह जानकारी अपनी वेबसाइट पर 15 मार्च, 2024 को शाम पाँच बजे तक जारी करनी होगी.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील हरिश साल्वे एसबीआई बैंक का पक्ष रख रहे थे. वहीं पूर्व क़ानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के साथ जाने-माने वकील प्रशांत भूषण एडीआर की ओर से पैरवी कर रहे थे. एडीआर ने एसबीआई को और समय देने की मांग वाली याचिका के ख़िलाफ़ अवमानना याचिका दायर की थी.
मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीरआर गावई, जस्टिस जबी पार्दीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने की.
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कोर्ट में हरीश साल्वे ने एसबीआई का पक्ष रखते हुए कहा, “हमारी एकमात्र समस्या यह है कि हम पूरी प्रक्रिया को रिवर्स की कोशिश कर रहे हैं. एसओपी ने सुनिश्चित किया कि हमारे कोर बैंकिंग सिस्टम और बॉन्ड नंबर में ख़रीदार का कोई नाम ना हो. हमें बताया गया कि इसे गुप्त रखा जाना चाहिए.”
इसके जवाब में चीफ़ जस्टिस ने कहा, “आपने जो जानकारी दी है, उसके अनुसार डोनर्स की जानकारी और राजनीतिक दलों की जानकारी दोनों ही मुंबई ब्रांच में है. तो आपके पास दोनो जानकारी एक साथ मुंबई में ही तो है.”
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “कोर्ट ने कहा कि डोनर्स की जानकारी और पार्टियों ने जो चंदा भुनाया उसकी जानकरी देनी है. एसबीआई कह रहा था कि उन्हें क्रॉस मैचिंग करनी है. कोर्ट ने कहा कि जो डेटा आपके पास उपलब्ध है, उसे जारी कर दीजिए. इसे मिलाने की कोई ज़रुरत नहीं है. ”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- नहीं बदलेगा फ़ैसला
सीजेआई ने एसबीआई से कहा, “आपको कुछ बातों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए. पिछले 26 दिनों में आपने क्या किया? आपके हलफ़नामे में इस पर एक शब्द नहीं लिखा गया है. बॉन्ड ख़रीदने वाले के लिए एक केवाईसी होती थी. तो आपके पास ख़रीदने वाले की जानकारी तो है ही. ”
इस पर हरीश साल्वे ने कहा इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे पास जानकारी है. डोनर्स से मिलान करने में वक़्त लगेगा. जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा जानकारी अगर सील कवर में है तो उस सील कवर को खोलिए और जानकारी दीजिए.
जस्टिस गवई ने कहा कि बैंक को कोर्ट का पहले दिया हुआ आदेश ही मानना होगा. कोर्ट ने फ़िलहाल इस मामले में अवमानना के अपने अधिकार इस्तेमाल नहीं किया है.
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इससे पहले पिछले महीने महीने सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया जो इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने वाला अकेला अधिकृत बैंक है, उसे निर्देश दिया था कि वह छह मार्च 2024 तक 12 अप्रैल, 2019 से लेकर अब तक ख़रीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी चुनाव आयोग को दे.
चुनाव आयोग को ये जानकारी 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर जारी करनी थी.
इसी मामले में एसबीआई ने जानकारी देने की तारीख़ 30 जून कर बढ़ाने की मांग की थी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड को अज्ञात रखना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियों को आर्थिक मदद से उसके बदले में कुछ और प्रबंध करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है.
इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय ज़रिया है.
यह एक वचन पत्र की तरह है, जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से ख़रीद सकता है और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीक़े से दान कर सकता है.
मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी. इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन लागू कर दिया था.
SBI इस आधार पर समय मांग रहा था कि “चुनावी बॉन्ड को डिकोड करने और डोनर्स के चंदे से मिलाया में वक़्त लगेगा. ये प्रक्रिया एक जटिल है और समय लेने वाली है.
SBI के अपने नियम हैं, उसके तहत उन्हें कोर्ट की मांग पर जानकारी देनी होगी.
SBI की याचिका के अनुसार, जिसने बॉन्ड दिया और जिसने चंदा लिया उसकी जानकारी अलग अलग है और एक जगह नहीं है. लेकिन दोनों को मुंबई शाखा में रखा गया है. ये एक समय लेने वाली प्रक्रिया है.
सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिट याचिका में एसबीआई ने कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी दो जगह हैं और इसका मिलान करके जानकारी जारी करना एक लंबी प्रक्रिया है. इसलिए कोर्ट आदेश का पालन करने के लिए 30 जून तक का वक़्त दे.
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क्या थी SBI की याचिका
बीते सप्ताह SBI ने इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका डाली थी.
SBI ने कहा था कि वह अदालत के निर्देशों का “पूरी तरह से पालन करने करना चाहता है. हालांकि, डेटा को डिकोड करना और इसके लिए तय की गई समय सीमा के साथ कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां हैं… इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदने वालों की पहचान छुपाने के लिए कड़े उपायों का पालन किया गया है. अब इसके डोनर और उन्होंने कितने का इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदा है, इस जानकारी का मिलान करना एक जटिल प्रक्रिया है.”
बैंक ने कहा था कि दो जनवरी, 2018 को इसे लेकर “अधिसूचना जारी की गई थी.” यह अधिसूचना केंद्र सरकार की ओर से साल 2018 में तैयार की गई इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना पर थी.
इसके क्लॉज़ 7 (4) में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अधिकृत बैंक हर सूरत में इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदार की जानकारी को गोपनीय रखे.
SBI ने याचिका में कहा था, ”हमारी एसओपी के सेक्शन 7.1.2 में साफ़ कहा गया था कि इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदने वाले की केवाईसी जानकारी को सीबीएस (कोर बैंकिंग सिस्टम) में ना डाला जाए. ऐसे में ब्रांच में जो इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए हैं, उनका कोई सेंट्रल डेटा एक जगह पर नहीं है. जैसे ख़रीदार का का नाम, बॉन्ड ख़रीदने की तारीख, जारी करने की शाखा, बॉन्ड की क़ीमत और बॉन्ड की संख्या. ये डेटा किसी सेंट्रल सिस्टम में नहीं हैं. ”
“बॉन्ड ख़रीदने वालों की पहचान गोपनीय ही रहे यह सुनिश्चित करने के लिए बॉन्ड जारी करने से संबंधित डेटा और बॉन्ड को भुनाने से संबंधित डेटा दोनों को को दो अलग-अलग जगहों में रखा गया है और कोई सेंट्रल डेटाबेस नहीं रखा गया.”
सभी ख़रीदारों की जानकारी को जिन ब्रांच से इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे गए वहां एक सीलबंद कवर में रखा गया. फिर इन सीलबंद कवर को SBI की मुख्य शाखा जो कि मुंबई में है, वहाँ दिया गया.”
अगर कोई अदालत इसकी जानकारी को मांगती है या जांच एजेंसियां किसी आपराधिक मामले में इस जानकारी को मांगती है, तभी ख़रीदार की पहचान साझा की जा सकती है.
बैंक ने अपनी याचिका में कहा है, ”इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदारों की पहचान को गोपनीय रखने के लिए बैंक ने बॉन्ड कि बिक्री और इसे भुनाने के लिए एक विस्तृत प्रकिया तैयार की है जो बैंक की देशभर में फैली 29 अधिकृत शाखाओं में फॉलो की जाती है.”




