Khabarwaad NatioanlDesk: राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के दौरान ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उनकी सोच अर्बन नक्सल वाली है. उनका घोषणा पत्र माओवाद को बढ़ावा देता है. इसके बाद से सत्ता और विपक्ष में घमासान जारी है. अर्बन नक्सल- ये टर्म पहले भी कई बार कहा-सुना जा चुका. खासकर सोशल मीडिया पर ये खूब ट्रेंड होता है.
पहली बार कब हुई थी चर्चा
साल 2018 में पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव दंगों के मामले में देश के अलग-अलग हिस्सों से कई बुद्धिजीवियों को हिरासत में लिया. इनमें वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, स्टेन स्वामी, साई बाबा, वेरनोन गोन्जाल्विस और अरुण परेरा जैसे नाम शामिल थे. पुलिस के मुताबिक, इनके पास से एक पत्र बरामद हुआ, जिसमें कथित तौर पर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश का जिक्र भी था. इन्हें अर्बन नक्सल कहा गया. हालांकि ये टर्म दंगों से एक साल पहले ही चर्चा में आ चुकी थी.
फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने मई 2017 में एक इंटरव्यू के दौरान ऐसे लोगों को अर्बन नक्सल कहा था, जो शहरों में रहते हुए सत्ता-विरोधी गतिविधियों को हवा देते हैं. ठीक तुरंत बाद उन्होंने एक किताब लॉन्च की, जिसका शीर्षक ही था- अर्बन नक्सल.
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किताब का विमोचन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने किया था. इस दौरान उन्होंने कहा था कि एक रिसर्च में पाया गया है कि दुनिया में कम से कम 21 ऐसे संगठन हैं जो भारत में पेशेवरों और शिक्षाविदों की शक्ल में लोगों को भेजते हैं. ये लोग माओवाद का अध्ययन कर अपने देश लौट जाते हैं. वे माओवाद के समर्थन के साथ-साथ उनकी फंडिंग का भी ध्यान रखते हैं.
उन 21 संगठनों का नाम-पता कुछ नहीं बताया गया. लेकिन अर्बन नक्सल शब्द इसके बाद से जमकर इस्तेमाल होने लगा. यहां तक कि कोई शहरी इंटेलेक्चुअल अगर मौजूदा सत्ता के खिलाफ कोई हिंसक बात करे तो उसके आसपास के लोग भी उसे ऐसी उपाधि दे डालते हैं.
ये टर्म एकदम हवा-हवाई भी नहीं
साल 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का एक दस्तावेज चर्चा में आया था. अर्बन पर्सपेक्टिव नाम से इस डॉक्युमेंट में एक खास रणनीति का जिक्र है. इसमें शहरी लीडरशिप में कोई मुहिम चलाई जाती है, जो सत्ता के विरोध में रहती है. ये पॉलिसी का विरोध भी हो सकता है, या किसी खास पार्टी या नेता का भी. इसके पीछे सोच ये है कि शहरी कनेक्शन होने की वजह से नेता काफी पढ़े-लिखे होंगे, और जरूरत पड़ने पर इंटरनेशनल स्तर पर जाकर भी अपने को सही साबित कर सकेंगे.
कथित अर्बन नक्सल एक और काम करते हैं. वे लोकल स्तर पर भी पैठ रखते हैं. जैसे यूनिवर्सिटी या एनजीओ तक. स्टूडेंट्स या स्थानीय लोगों पर उनका सीधा असर रहता है. ऐसे में वे जो कहेंगे, काफी लोग सपोर्ट में आ जाएंगे. कुल मिलाकर सरकार को गिराने या उससे अपनी बात मनवाने के लिए पक्की रणनीति बनाई जा सकती है, जिसमें लोकल और इंटरनेशनल दोनों स्तर पर सहयोग हो.
भीमा कोरेगांव केस की ही बात करें तो इसमें जिनको पकड़ा गया, उनमें से लगभग सभी बुद्धिजीवी जमात से थे. इस वजह से इंटरनेशनल स्तर पर भी मुद्दा उछला था. नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी ने भी तब आरोपियों को अर्बन नक्सल बताया था. जिस तरह से जांच हुई, उसमें माना गया कि शहरों में रहते इंटेलेक्चुअल हिंसा की स्टोरी रचते हैं, जिसपर देशविरोधी ताकतें फंडिंग करती हैं. ये लोग कथित तौर पर एक खास मांग के साथ दंगा-फसाद भड़काते हैं.




