नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 (विक्रम संवत 2083) में एक दुर्लभ खगोलीय संयोग बनने जा रहा है जिसमें ज्येष्ठ मास दो बार आएगा। इस कारण पूरा वर्ष 13 महीनों का हो जाएगा। अतिरिक्त पड़ने वाले इस चंद्र मास को अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है, जो 17 मई 2026 से 15 जून 2026 तक रहेगा।
ज्योतिष शास्त्र में अधिकमास को अत्यंत पवित्र माना गया है। यह पूरा मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दौरान पूजा-पाठ, दान-पुण्य, जप-तप, व्रत और धार्मिक ग्रंथों का पाठ विशेष फलदायी होता है। इसे आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का सर्वोत्तम समय माना जाता है, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास की संज्ञा दी गई है।
सौर वर्ष में 365 दिन तथा चंद्र वर्ष में 354 दिन होते हैं। दोनों के बीच हर साल करीब 11 दिन का अंतर उत्पन्न होता है। इस अंतर को समायोजित करने के लिए हर 32 महीने 16 दिन के लगभग अंतराल पर एक अतिरिक्त चंद्र मास स्वतः जुड़ जाता है, जिसे अधिकमास कहते हैं। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास ही यह अतिरिक्त मास बनेगा, जिससे एक सामान्य ज्येष्ठ और एक अधिक ज्येष्ठ होगा। दोनों मिलाकर ज्येष्ठ काल लगभग 58-59 दिन का हो जाएगा।
हालांकि अधिकमास में धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों का विशेष महत्व है, लेकिन इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन, भूमि पूजन, नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार अधिकमास का मुख्य उद्देश्य सौर-चंद्र कैलेंडर में संतुलन स्थापित करना होता है, इसलिए इसे उत्सवों और नए कार्यारंभ के लिए निष्क्रिय काल माना जाता है।
विक्रम संवत 2083 का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होगा और अधिक ज्येष्ठ के कारण यह वर्ष पूरे 13 मास का होगा। ज्योतिषी इसे भक्तों के लिए पुण्य कमाने का दुर्लभ अवसर बता रहे हैं।




