जगदलपुर। बीती रात अलनार गांव में नींद और खामोशी के बीच अचानक गड़गड़ाहट हुई। कच्चे मकान की दीवार ढही और पल भर में मलबे के नीचे दबा 14 साल का लोकेश नाग हमेशा के लिए चुप हो गया।
गांव का उजला चेहरा माने जाने वाला लोकेश सातवीं कक्षा का छात्र था। घर के आंगन में जब भी बच्चों की भीड़ लगती, वही सबसे आगे खड़ा होकर हंसी-मजाक करता। लेकिन उस रात चार कमरों वाले मिट्टी के घर में नींद में डूबे दस लोगों को क्या पता था कि सुबह होते-होते उनकी दुनिया बदल जाएगी।
“बचाने की कोशिश की, लेकिन…”
हादसे के वक्त सब गहरी नींद में थे। रात करीब ढाई बजे की बात है, जब अचानक दीवार भरभराकर गिरी और पूरा कमरा मलबे में तब्दील हो गया।
चीख-पुकार मची, लोग दौड़े। ग्रामीणों ने फावड़े और हाथों से मलबा हटाया। लोकेश और उसकी दादी दबे मिले। दादी को घायल हालत में निकाला गया, लेकिन लोकेश को जब तक बाहर लाया गया, तब तक उसकी सांसें थम चुकी थीं।
सिस्टम पर सवाल
सुबह तक पुलिस मौके पर पहुंची, शव को स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। लेकिन वहां डॉक्टर मौजूद नहीं थे। परिजनों और ग्रामीणों को 5 घंटे तक इंतजार करना पड़ा।
अंततः शव को डिमरापाल अस्पताल ले जाया गया, जहां पोस्टमार्टम हुआ और फिर अंतिम संस्कार।
गांव के बुजुर्ग कहते हैं—“हादसा तो हो गया, लेकिन डॉक्टरों की गैरमौजूदगी ने हमारे दुख को और गहरा कर दिया।”
टूटा घर, टूटा भरोसा
अब उस घर की एक दीवार गायब है, आंगन में पसरा सन्नाटा है। बच्चे का स्कूल बैग और किताबें वैसे ही कोने में रखी हैं, जैसे वो अगले दिन पढ़ने वाला हो। दादी अब भी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही हैं।
लोकेश का जाना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उन हजारों गांवों की हकीकत भी है जहां कच्चे मकान और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था हर दिन किसी नई त्रासदी को दावत दे रहे हैं।




