नई दिल्ली.
डॉलर के मुकाबले रुपये में शुक्रवार को तेज गिरावट दर्ज की गई। रुपया 89.66 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ, जो पिछले करीब चार वर्षों में सबसे निचला स्तर है। इस गिरावट ने करेंसी बाजार से जुड़े ट्रेडर्स और विश्लेषकों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में रुपये पर दबाव बना रह सकता है और यह वर्ष के अंत तक 91 के स्तर को भी छू सकता है।
मौजूदा वित्त वर्ष में अब तक रुपये में 4.50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ चुकी है, जबकि केवल इस सप्ताह में ही इसकी वैल्यू में 1.21 प्रतिशत की कमी देखी गई है।
तेल कीमतों में राहत बेअसर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आई है, लेकिन रुपये में भारी गिरावट के कारण पेट्रोल-डीजल के सस्ता होने की संभावना लगभग समाप्त मानी जा रही है। आयात पर निर्भरता और कमजोर मुद्रा के चलते तेल कंपनियों पर लागत का दबाव बना रहेगा।
आरबीआई की दर कटौती की उम्मीदों को झटका
दिसंबर में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन रुपये में गिरावट के बाद यह उम्मीद कमजोर पड़ गई है। जानकारों का कहना है कि कमजोर रुपये से आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ेगी, जिससे महंगाई पर फिर से दबाव बढ़ सकता है।
बढ़ सकती है महंगाई
हालांकि हाल के महीनों में खुदरा महंगाई के आंकड़े सामान्य स्तर पर रहे हैं, लेकिन रुपये की कमजोरी के चलते आयातित सामान महंगा हो सकता है। इससे घरेलू बाजार में महंगाई के आंकड़ों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर
रुपये में गिरावट के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव आ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह ट्रेंड जारी रहा तो यह देश की आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकता है।
रुपये की लगातार कमजोर होती स्थिति ने बाजार, उद्योग और उपभोक्ताओं सभी के लिए चिंता बढ़ा दी है। आर्थिक विशेषज्ञ रुपये को स्थिर करने के लिए नीतिगत कदमों की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।




