आशीष पदमवार
सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पूवर्ती गांव का रहने वाला हिड़मा भारत के सबसे खतरनाक और कुख्यात नक्सली नेताओं में से एक है। उसका जन्म 1980 के दशक में हुआ था और 1990 के दशक की शुरुआत में उसने नक्सल आंदोलन से जुड़कर हिंसा का रास्ता अपना लिया। साधारण नक्सली के रूप में शुरुआत करने वाला हिड़मा 2001 से 2007 के बीच संगठन में तेजी से आगे बढ़ा।
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सलवा जुडूम के खिलाफ नक्सलियों के प्रतिरोध ने हिड़मा को संगठन में एक प्रभावशाली नेता बना दिया। 2007 में उरपल मेट्टा में हुए हमले में सीआरपीएफ के 24 जवानों की शहादत के बाद वह माओवादियों के पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन-1 का प्रमुख बन गया। इसके अलावा वह दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZ) का अहम सदस्य और अब केंद्रीय कमेटी में भी शामिल है।

हिड़मा पर ताड़मेटला हमले सहित झीरम, बुरकापाल, टेकलगुड़म, भेजी और मिनपा जैसे 27 से अधिक बड़े नक्सली हमलों में शामिल होने का आरोप है। ताड़मेटला हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे, जो देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में से एक है।
बताया जाता है कि हिड़मा बचपन से ही तेज-तर्रार था और नक्सली संगठन ने उसे 16 वर्ष की उम्र में ही बच्चों की विंग का अध्यक्ष बना दिया था। वर्तमान में वह दक्षिण सुकमा क्षेत्र में सक्रिय है और उसके अधीन 150 से अधिक प्रशिक्षित कमांडर काम करते हैं। हिड़मा की पकड़ संगठन, रणनीति और इलाके पर इतनी मजबूत है कि वह सुरक्षा बलों के लिए अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।




