बिलासपुर। रेलवे की नींद वैसे ही मशहूर है, ऊपर से ITBP के जवान भी उसी लय में सो गए। हटिया-दुर्ग एक्सप्रेस में जो किस्सा हुआ, वो फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा है— फर्क बस इतना कि इसमें हीरो हथियार खो बैठा और विलेन फ्री में लैस हो गया।
एएसआई साहब और उनके साथी रिवॉल्वर, चार मैगजीन, 24 कारतूस, मोबाइल और 10 हजार कैश लेकर जनरल डिब्बे में चढ़ गए। सोचा होगा कि “देश की सीमा पर डटे हैं, तो बैग की रखवाली कौन सा मुश्किल काम है!” लेकिन जनरल कोच में हकीकत ये है कि आंख झपकते ही आपका सामान हवा हो सकता है। और यही हुआ।
रात 3 बजे चांपा में नींद आई, सुबह 5:50 पर भाटापारा में जब नींद खुली तो बैग गायब। रेलवे और जीआरपी सकते में, यात्री ठहाके लगाते हुए—
“भाई, चोर तो चोर, यहां तो पूरा गोला-बारूद का स्टोर मिल गया उसे।”
अब जांच बैठी है। लेकिन बड़ा सवाल ये है— जब हथियार संभालने वाले ही नींद में पिट्ठू गंवा दें, तो फिर आम आदमी अपने बैग को किस ताले में बंद करे?
रेलवे सुरक्षा की इस घटना ने साबित कर दिया है कि यहां “न बंदूक सुरक्षित, न बटुआ।”




