नई दिल्ली। भारतीय न्यायिक प्रणाली पर लंबित मामलों का भारी बोझ है। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) पर उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 21 जुलाई 2025 तक देशभर में कुल 5.29 करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें से 4.65 करोड़ मामले जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में विचाराधीन हैं, जबकि 63.30 लाख मामले उच्च न्यायालयों में और 86,742 मामले सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।
न्यायाधीशों की भारी कमी
केवल लंबित मामलों की संख्या ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रणाली को पूरी क्षमता से संचालित करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कानून और न्याय मंत्रालय के अनुसार, 21 जुलाई 2015 तक जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में स्वीकृत 25,843 न्यायिक पदों में से केवल 21,122 पदों पर ही नियुक्तियाँ हुई हैं।
Read Also- संसद में आज से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पहलगाम हमले पर अहम चर्चा, हंगामे के बीच राजनीतिक पारा चढ़ा
मामलों के निपटारे के लिए बनीं विशेष समितियां
लंबे समय से लंबित मामलों को निपटाने के उद्देश्य से सरकार ने सभी 25 उच्च न्यायालयों में पांच वर्ष से अधिक पुराने मामलों के समाधान के लिए बकाया समिति (Backlog Committee) गठित की है। अब ऐसी समितियां जिला न्यायालयों के तहत भी स्थापित की जा रही हैं।
न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सरकार का बयान
कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने हाल ही में संसद में जानकारी दी कि 1 मई 2014 से 21 जुलाई 2025 के बीच सुप्रीम कोर्ट में 70 न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई है।
उसी अवधि में 1,058 नए न्यायाधीश उच्च न्यायालयों में नियुक्त हुए, जबकि 794 अतिरिक्त न्यायाधीशों को स्थायी रूप से नियुक्त किया गया। मंत्री ने यह भी बताया कि मई 2014 में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 906 थी, जो अब बढ़कर 1,122 हो गई है।
Read Also- Rule Change: क्रेडिट कार्ड… UPI और LPG समेत 1 अगस्त से बदल रहे ये 6 बड़े नियम, बढ़ सकता है मंथली खर्च
सांसदों-विधायकों के मामलों के लिए 10 विशेष अदालतें
निर्वाचित प्रतिनिधियों के आपराधिक मामलों को तेजी से निपटाने के लिए 9 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 10 विशेष अदालतें कार्यरत हैं। इनका गठन 2017 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर किया गया था। ये अदालतें फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTC) की तर्ज पर काम करती हैं।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थिति
जून 2025 तक देशभर में कुल 865 फास्ट ट्रैक कोर्ट कार्यरत हैं। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मृत्युदंड या आजीवन कारावास जैसे गंभीर मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। इसके बाद पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा योग्य अपराधों, और फिर अन्य मामलों को सूचीबद्ध किया जाए।




