धमतरी। सरकार कहती है, प्रदेश में सुशासन है। लेकिन नगरी के बोरई सिविल अस्पताल में रविवार की रात जो हुआ, उसने इस दावे को आईना दिखा दिया। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल युवक को जब ग्रामीण और पुलिस इलाज के लिए अस्पताल लाए, तो वहां इलाज नहीं, सन्नाटा मिला। न डॉक्टर, न नर्स, न प्राथमिक उपचार। बस बंद दरवाज़े और खाली कुर्सियां।
बोरई-घुटकेल मार्ग पर मोटरसाइकिल सहित बेसुध पड़े युवक को ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए अस्पताल पहुंचाया। यहां तक सब ठीक था। इसके बाद “सुशासन” ने एंट्री ली, आपातकालीन सेवा खुद आपात स्थिति में थी। आरोप है कि इलाज के अभाव में युवक ने दम तोड़ दिया।
आक्रोशित ग्रामीणों ने अस्पताल परिसर में ही शव रखकर पूरी रात धरना दिया। उनका सवाल सीधा था – अगर समय पर डॉक्टर मौजूद होते, तो क्या जान बच सकती थी? जवाब देने वाला कोई नहीं था। अस्पताल का मुख्य द्वार नारे सुन रहा था, प्रशासन मौन था।
ग्रामीणों ने इसे महज़ लापरवाही नहीं, “प्रशासनिक असंवेदनशीलता” बताया। उनका कहना है कि कागज़ों में स्वास्थ्य सेवाएं 24×7 चलती हैं, ज़मीन पर 0×0। सुशासन के पोस्टर चमकते हैं, लेकिन इमरजेंसी वार्ड अंधेरे में डूबा रहता है।
यह घटना सिर्फ एक अस्पताल की नहीं, उस व्यवस्था की है जो दावा तो करती है कि सब दुरुस्त है, मगर संकट की घड़ी में गायब मिलती है। सवाल यह है – क्या सुशासन सिर्फ भाषणों में है, या अस्पताल की ड्यूटी रोस्टर में भी कभी दिखाई देगा?
अगर स्वास्थ्य व्यवस्था “ऑन पेपर” ही चलती रही, तो सड़क हादसे से ज्यादा खतरनाक होगी अस्पताल की खामोशी।




