छत्तीसगढ़ की पावन धरा सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि यहाँ के अदम्य साहस और अटूट सामाजिक चेतना के लिए भी जानी जाती है। इस चेतना की मशाल को थामे खड़ी हैं यहाँ की वे महिलाएं, जिन्होंने अभावों के बीच न केवल अपना रास्ता बनाया, बल्कि पूरे समाज का मार्ग प्रशस्त किया।
अशिक्षा, गरीबी, घने जंगलों की चुनौतियाँ और दशकों पुराने सामाजिक बंधनों को पीछे छोड़कर ये महिलाएं आज विकास और अधिकारों की नई पहचान बन चुकी हैं। चाहे वह जल-जंगल-जमीन की रक्षा का संकल्प हो, शिक्षा का उजियारा फैलाना हो या नक्सल हिंसा के बीच शांति और आजीविका की नई राह तलाशना, इनकी जीवटता ने छत्तीसगढ़ की तस्वीर बदल दी है।
आइए, रूबरू होते हैं छत्तीसगढ़ की उन प्रभावशाली महिला नायिकाओं से, जिनकी संघर्ष गाथा और नेतृत्व की क्षमता आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।

माता राजमोहिनी देवी छत्तीसगढ़ के समाज सुधार आंदोलन के इतिहास में एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अपनी सादगी और आध्यात्मिक शक्ति से हज़ारों आदिवासियों के जीवन की दिशा बदल दी। सरगुजा क्षेत्र में जन्मीं इस महान महिला ने उस दौर में आवाज़ उठाई जब समाज अंधविश्वास, शराब और कुप्रथाओं की जकड़ में था।
माता राजमोहिनी देवी: समाज सुधार की प्रणेता
- अकाल और आध्यात्मिक बोध (1951)
राजमोहिनी देवी के समाज सुधार की यात्रा 1951 के भीषण अकाल के दौरान शुरू हुई। माना जाता है कि उस समय उन्हें एक आध्यात्मिक अनुभूति हुई, जिसने उन्हें लोगों की सेवा और कुरीतियों को दूर करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि वे अंधविश्वास और नशा छोड़ें और स्वावलंबन का मार्ग अपनाएं।
- राजमोहिनी देवी आंदोलन
उन्होंने एक व्यापक समाज सुधार आंदोलन चलाया, जिसे ‘राजमोहिनी देवी आंदोलन‘ के नाम से जाना जाता है। उनके मुख्य सिद्धांत थे:
- नशामुक्ति: आदिवासियों के बीच शराब के सेवन को पूरी तरह बंद करना।
- अहिंसा और सत्य: महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अहिंसा का प्रचार किया।
- अंधविश्वास का अंत: भूत-प्रेत और टोना-टोटका जैसी रूढ़ियों के खिलाफ जागरूकता।
- शाकाहार: जीव हत्या को रोकने और सात्विक जीवन शैली अपनाने पर ज़ोर।
- गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव
वे महात्मा गांधी के आदर्शों से अत्यंत प्रभावित थीं। उन्होंने आदिवासियों को खादी पहनने, चरखा चलाने और स्वच्छता के प्रति जागरूक किया। उनके कार्यों की गूँज इतनी प्रभावशाली थी कि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनके कार्यों की सराहना करने आए थे।
- बापू धर्म सभा आदिवासी सेवा मंडल
उन्होंने अपने कार्यों को संगठित रूप देने के लिए ‘बापू धर्म सभा आदिवासी सेवा मंडल‘ की स्थापना की। इसके माध्यम से उन्होंने शिक्षा, कृषि सुधार और ग्रामीण विकास के लिए कई आश्रम और केंद्र खुलवाए।
- सम्मान और उपलब्धि
उनके निस्वार्थ सेवा भाव और समाज में लाए गए क्रांतिकारी बदलाव के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री‘ (1989) से सम्मानित किया। आज भी अंबिकापुर (सरगुजा) में उनके नाम पर कृषि कॉलेज और कई संस्थान उनकी स्मृति को जीवित रखे हुए हैं।
“उन्होंने तलवार से नहीं, बल्कि सत्य और तपस्या से एक पूरे समाज के भीतर का अंधेरा दूर किया।”

छत्तीसगढ़ के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में मिनी माता का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे न केवल छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद थीं, बल्कि दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के उत्थान के लिए समर्पित एक ऐसी शख्सियत थीं, जिन्हें आज भी ‘ममता की प्रतिमूर्ति’ के रूप में याद किया जाता है।
मिनी माता: ममता और न्याय की प्रतिध्वनि
- प्रारंभिक जीवन और नामकरण
मिनी माता का जन्म 1913 में असम के नुआगाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम मीनाक्षी देवी था। उनका विवाह सतनामी पंथ के गुरु अगमदास जी के साथ हुआ, जिसके बाद वे छत्तीसगढ़ आईं। यहाँ के लोगों के प्रति उनके अगाध प्रेम और सेवा भाव के कारण उन्हें श्रद्धा से ‘मिनी माता’ पुकारा जाने लगा।
- प्रथम महिला सांसद का गौरव
1952 में जब देश में पहले आम चुनाव हुए, तब वे सारंगढ़ सीट से निर्विरोध चुनी गईं। इसके बाद वे लगातार 1972 तक रायपुर, जांजगीर और महासमुंद क्षेत्रों से लोकसभा सदस्य रहीं। संसद में उनकी उपस्थिति छत्तीसगढ़ की आवाज़ को मजबूती प्रदान करती थी।
- अस्पृश्यता निवारण और सामाजिक सुधार
मिनी माता ने समाज में व्याप्त छुआछूत और जातिवाद जैसी कुरीतियों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया।
- अस्पृश्यता निवारण अधिनियम (1955): इस कानून को पारित कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- उन्होंने दलितों और आदिवासियों के लिए शिक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसर सुनिश्चित किए।
- बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी बुराइयों के खिलाफ उन्होंने गाँव-गाँव जाकर चेतना जगाई।
- विकास के कार्य: हसदेव बांगो बांध
छत्तीसगढ़ के किसानों की खुशहाली के लिए उन्होंने सिंचाई सुविधाओं पर विशेष जोर दिया। कोरबा जिले में स्थित हसदेव बांगो बांध के निर्माण के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए, जिसे आज उनके सम्मान में ‘मिनी माता हसदेव बांगो परियोजना’ के नाम से जाना जाता है।
- महिला सशक्तिकरण की मिसाल
उस दौर में जब महिलाओं का घर से निकलना भी कठिन था, मिनी माता ने राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित किया। उन्होंने महिलाओं को शिक्षित होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने हेतु निरंतर प्रेरित किया।
- शहादत और विरासत
11 अगस्त 1972 को एक विमान दुर्घटना में उनका दुखद निधन हो गया। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में ‘मिनी माता राज्य स्तरीय सम्मान’ स्थापित किया है, जो महिला उत्थान के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को दिया जाता है।

बस्तर के जन-आंदोलनों और आदिवासी अधिकारों की बात जब भी होती है, फूलन देवी (जिन्हें बस्तर में ‘माता‘ या ‘दीदी‘ के रूप में सम्मान दिया जाता है) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
ध्यान रहे, ये उत्तर प्रदेश वाली ‘दस्यु सुंदरी’ फूलन देवी नहीं हैं, बल्कि बस्तर की एक सशक्त आदिवासी नेत्री और जल-जंगल-जमीन की रक्षक हैं।
फूलन देवी: बस्तर की प्रखर आदिवासी आवाज
- जल, जंगल और जमीन का संघर्ष
फूलन देवी बस्तर के आदिवासी समाज की उन अग्रणी महिलाओं में से हैं, जिन्होंने अपनी माटी और संस्कृति को बचाने के लिए दशकों तक संघर्ष किया। उन्होंने बड़े बांधों, खनन परियोजनाओं और उद्योगों के कारण होने वाले विस्थापन (Displacement) के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट किया।
- बोधघाट परियोजना और जन-आंदोलन
बस्तर में इंद्रावती नदी पर बनने वाली बोधघाट जलविद्युत परियोजना के खिलाफ हुए विशाल जन-आंदोलन में फूलन देवी की भूमिका निर्णायक थी। उन्होंने गांव-गांव जाकर आदिवासियों को यह समझाया कि कैसे यह बांध उनके जंगलों और आजीविका को लील जाएगा। उनके नेतृत्व में हुए कड़े विरोध के कारण ही अंततः इस परियोजना पर रोक लगानी पड़ी।
- ‘बस्तर बचाओ आंदोलन‘ की नेतृत्वकर्ता
उन्होंने ‘बस्तर बचाओ आंदोलन‘ के माध्यम से आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों (जैसे- पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून) के प्रति जागरूकता फैलाई। उनका मानना था कि बस्तर के संसाधनों पर पहला अधिकार वहां के मूल निवासियों का है।
- मानवाधिकार और शांति की अपील
बस्तर में चल रहे नक्सल संघर्ष और हिंसा के बीच फूलन देवी ने हमेशा आदिवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा की बात की। उन्होंने सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच पिस रहे निर्दोष आदिवासियों की आवाज को प्रशासन और सरकार तक पहुँचाने का जोखिम भरा काम किया।
- सादगी और निडरता
फूलन देवी की पहचान उनकी बेहद साधारण जीवनशैली और निडर स्वभाव से है। वे बिना किसी राजनीतिक लालच के, पैदल चलकर मीलों दूर के गांवों तक पहुँचती थीं। उनकी एक आवाज पर बस्तर के हजारों आदिवासी अपना हक मांगने के लिए सड़कों पर उतर आते थे।

फूलन देवी ने यह साबित किया कि नेतृत्व केवल पदों से नहीं, बल्कि लोगों के प्रति अटूट निष्ठा से आता है। आज बस्तर की कई युवा आदिवासी युवतियां उन्हें अपना आदर्श मानकर सामाजिक कार्यों में आगे आ रही हैं।
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल से ताल्लुक रखने वाली बुधरी ताती का नाम इतिहास के पन्नों में एक ‘ऐतिहासिक भूल’ और ‘अन्याय’ के विरुद्ध संघर्ष की मिसाल के रूप में दर्ज है। उन्हें “भारत की पहली महिला इंजीनियर” (सांकेतिक रूप से) या “नेहरू की आदिवासी बेटी” के रूप में भी याद किया जाता है, लेकिन उनके साथ जो हुआ वह समाज की संकीर्ण सोच का एक काला अध्याय है।
बुधरी ताती: एक माला, एक उद्घाटन और 27 साल का वनवास
- वह ऐतिहासिक पल (1959)
साल 1959 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू राउरकेला स्टील प्लांट (ओडिशा) का उद्घाटन करने पहुँचे थे। प्रोटोकॉल के तहत एक स्थानीय आदिवासी मज़दूर महिला को उद्घाटन के लिए चुना गया। वह महिला थीं बुधरी ताती, जो उस समय वहाँ दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम कर रही थीं।
नेहरू जी ने बुधरी के हाथों से प्लांट का बटन दबवाया और सम्मान स्वरूप उनके गले में एक फूलों की माला पहना दी।
- सामाजिक बहिष्कार की त्रासदी
यही सम्मान बुधरी के लिए अभिशाप बन गया। जब वे अपने गाँव लौटीं, तो रूढ़िवादी आदिवासी समाज ने नेहरू द्वारा माला पहनाने को ‘विवाह’ का प्रतीक मान लिया। समाज का तर्क था कि एक गैर-आदिवासी (नेहरू) ने उन्हें माला पहनाई है, इसलिए उनका धर्म भ्रष्ट हो गया है।
- उन्हें गाँव से निकाल दिया गया।
- अपनों ने उनसे नाता तोड़ लिया।
- उन्हें ‘शादीशुदा’ घोषित कर समाज से बहिष्कृत कर दिया गया।
- नौकरी से बर्खास्तगी और अभावों का जीवन
विवाद इतना बढ़ा कि राउरकेला स्टील प्लांट प्रबंधन ने भी उन्हें नौकरी से निकाल दिया। इसके बाद बुधरी ताती ने दशकों तक बेहद गरीबी और गुमनामी में जीवन बिताया। वे जंगलों में लकड़ियाँ काटकर और मज़दूरी करके अपना पेट पालती रहीं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
- न्याय की लड़ाई और वापसी (1980 के दशक में)
दशकों बाद जब मीडिया और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से उनकी कहानी दुनिया के सामने आई, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को इस बारे में पता चला। 1985 के आसपास उनके हस्तक्षेप के बाद:
- बुधरी ताती को राउरकेला स्टील प्लांट में दोबारा नौकरी मिली।
- उन्हें सम्मान वापस मिला और उनके रहने की व्यवस्था की गई।
- विरासत और प्रेरणा
बुधरी ताती की कहानी छत्तीसगढ़ और ओडिशा के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों में परंपरा बनाम आधुनिकता के संघर्ष का प्रतीक है। वह एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने अनजाने में ही सही, आधुनिक भारत की नींव रखने में नेहरू जी का साथ दिया, लेकिन समाज की रूढ़ियों ने उन्हें उसकी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया।
बुधरी ताती का निधन साल 2017 में हुआ। उनकी कहानी आज भी हमें याद दिलाती है कि सामाजिक सुधार और चेतना, भौतिक विकास (जैसे स्टील प्लांट) से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले की मधुलिका रामटेके महिला सशक्तिकरण और आर्थिक स्वावलंबन का एक आधुनिक और बेहद प्रेरणादायक चेहरा हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे फौलादी हों, तो गाँव की एक साधारण महिला भी हज़ारों परिवारों की तकदीर बदल सकती है।
मधुलिका रामटेके: ‘मां बम्लेश्वरी बैंक‘ की शिल्पकार
- एक छोटे से समूह से विशाल बैंक तक
मधुलिका जी ने साल 2001 में राजनांदगांव के डोंगरगढ़ क्षेत्र में महिलाओं को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने मात्र कुछ महिलाओं और बहुत कम बचत (प्रति माह 2 रुपये से 10 रुपये) के साथ छोटे-छोटे ‘स्वयं सहायता समूह’ (SHG) बनाए। आज यह अभियान ‘मां बम्लेश्वरी जनहितकारी समिति‘ के रूप में एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है, जिससे हज़ारों महिलाएं जुड़ी हैं।
- महिलाओं का अपना बैंक
उन्होंने महिलाओं के लिए एक ऐसा वित्तीय ढांचा तैयार किया जहाँ उन्हें साहूकारों के चंगुल से मुक्ति मिली। उनके द्वारा गठित समूहों ने अपना खुद का ‘बैंक’ जैसा सिस्टम बनाया, जहाँ महिलाएं आसान किश्तों पर ऋण लेकर अपना छोटा व्यवसाय शुरू कर सकती हैं। आज इस अभियान का टर्नओवर करोड़ों में है, जिसे पूरी तरह ग्रामीण महिलाएं ही संभालती हैं।
- कुरीतियों के खिलाफ जंग
मधुलिका रामटेके का कार्य केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ भी मोर्चा खोला:
- नशामुक्ति: गाँव-गाँव जाकर शराबबंदी के लिए महिलाओं को लामबंद किया।
- अंधविश्वास: जादू-टोना और टोनही प्रताड़ना जैसी कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया।
- स्वच्छता: गाँवों में स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति महिलाओं को शिक्षित किया।
- जैविक खेती और आजीविका
उन्होंने महिलाओं को केवल बचत करना ही नहीं सिखाया, बल्कि उन्हें जैविक खेती (Organic Farming), पशुपालन और लघु उद्योगों (जैसे वर्मी कंपोस्ट बनाना) से जोड़कर आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया।
- राष्ट्रीय सम्मान (नारी शक्ति पुरस्कार)
मधुलिका रामटेके के इस असाधारण नेतृत्व और सामाजिक बदलाव के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘नारी शक्ति पुरस्कार‘ से सम्मानित किया। यह पुरस्कार उन्हें राष्ट्रपति के हाथों प्रदान किया गया, जो उनके वर्षों के कठिन परिश्रम का प्रमाण है।

बस्तर के संघर्षशील नेतृत्व की जब बात होती है, तो हिडमे मरकाम का नाम एक ऐसी युवा आदिवासी नेत्री के रूप में उभरता है, जिन्होंने ‘जल-जंगल-जमीन’ की रक्षा के लिए जेल की सलाखों और कड़े दमन का सामना किया। वे बस्तर में मानवाधिकारों और विशेषकर आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक प्रखर आवाज मानी जाती हैं।
हिडमे मरकाम: बस्तर के जंगलों की निर्भीक आवाज
- ‘जेल बंदी रिहाई मंच‘ का नेतृत्व
हिडमे मरकाम ‘जेल बंदी रिहाई मंच‘ की संयोजक हैं। उन्होंने बस्तर के उन सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों की कानूनी लड़ाई लड़ने और उनकी रिहाई की मांग उठाने का बीड़ा उठाया, जो अक्सर नक्सलवाद के नाम पर बिना किसी पुख्ता सबूत के सालों तक जेलों में बंद रहते हैं।
- हसदेव और पर्यावरण संरक्षण का संघर्ष
वे केवल बस्तर तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के जंगलों को बचाने के लिए चल रहे आंदोलन में भी अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई। उन्होंने बड़े उद्योगों और खनन परियोजनाओं के कारण आदिवासियों के विस्थापन और प्रकृति के विनाश के खिलाफ निरंतर मोर्चा संभाला है।
- मानवाधिकारों के लिए जेल यात्रा
मार्च 2021 में, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक कार्यक्रम के दौरान हिडमे मरकाम को गिरफ्तार किया गया था। उन पर कई गंभीर आरोप लगाए गए, जिसके कारण उन्हें लगभग दो साल तक जेल में रहना पड़ा। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी गिरफ्तारी का विरोध हुआ। अंततः, न्यायालय द्वारा कई मामलों में बरी किए जाने के बाद वे 2023 के शुरुआत में जेल से बाहर आईं।
- महिलाओं और ग्राम सभा की शक्ति
हिडमे का मानना है कि आदिवासियों की समस्याओं का समाधान ‘पेसा कानून‘ (PESA Act) और ग्राम सभाओं को सशक्त करने में निहित है। उन्होंने आदिवासी महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया ताकि वे पुलिसिया कार्रवाई और सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ खड़ी हो सकें।
- शांति और न्याय की पक्षधर
नक्सल हिंसा और सरकारी दबाव के बीच पिस रहे बस्तर के आम आदिवासियों के लिए हिडमे मरकाम एक उम्मीद की किरण की तरह हैं। वे लगातार यह मांग करती रही हैं कि बस्तर में शांति के लिए आदिवासियों से संवाद किया जाना चाहिए और उनके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
हिडमे मरकाम का व्यक्तित्व यह दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी की आदिवासी महिलाएं अब केवल चुपचाप अन्याय सहने वाली नहीं हैं, बल्कि वे कानून और लोकतंत्र के दायरे में रहकर अपनी जमीन की रक्षा करना जानती हैं।
छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेतृत्व और सामाजिक क्रांति की चर्चा ममता ध्रुवे के बिना अधूरी है। वे राजनांदगांव और मोहला-मानपुर क्षेत्र की एक ऐसी प्रखर आदिवासी नेत्री हैं, जिन्होंने ज़मीनी स्तर पर आदिवासियों को संगठित कर सत्ता और प्रशासन के सामने अपनी बात मनवाने का साहस दिखाया है।
ममता ध्रुवे: संघर्ष और जन-आंदोलन की मशाल
- जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी का नेतृत्व
ममता ध्रुवे लंबे समय से ‘जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी‘ जैसी संस्थाओं से जुड़कर आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। उन्होंने मोहला-मानपुर के इलाकों में वन अधिकार पट्टे दिलाने और आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल होने से बचाने के लिए कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया है।
- पेसा कानून और ग्राम सभा की शक्ति
ममता ध्रुवे का मुख्य ज़ोर पेसा (PESA) कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने पर रहा है। उनका मानना है कि जब तक ग्राम सभाएं शक्तिशाली नहीं होंगी, तब तक आदिवासियों का वास्तविक विकास संभव नहीं है। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को यह सिखाया कि कैसे वे अपनी ग्राम सभा के माध्यम से अपने गाँव के विकास और संसाधनों का निर्णय स्वयं ले सकते हैं।
- महिला कमांडो और नशामुक्ति अभियान
ग्रामीण अंचलों में शराब की लत के कारण होने वाली घरेलू हिंसा और आर्थिक बर्बादी को रोकने के लिए ममता ध्रुवे ने महिलाओं की टोली बनाई। उन्होंने महिला कमांडो के माध्यम से गाँवों में नशामुक्ति के कड़े नियम लागू करवाए और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए छोटे उद्योगों से जोड़ा।
- विस्थापन और खनन के खिलाफ मोर्चा
बस्तर और मानपुर के क्षेत्रों में जब भी बड़ी कंपनियों द्वारा खनन के लिए आदिवासियों की ज़मीन लेने की बात आई, ममता ध्रुवे एक ढाल बनकर खड़ी हुईं। उन्होंने तर्क दिया कि विकास के नाम पर आदिवासियों की संस्कृति और पर्यावरण का विनाश नहीं होना चाहिए।
- राजनीतिक चेतना का प्रसार
ममता ध्रुवे ने केवल सड़क पर आंदोलन नहीं किया, बल्कि चुनावी राजनीति में भी आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की। वे जिला पंचायत सदस्य के रूप में भी सक्रिय रहीं और प्रशासनिक मंचों पर आदिवासियों की समस्याओं को मुखरता से रखा।
ममता ध्रुवे की सबसे बड़ी ताकत उनकी वक्तृत्व कला (Speech) है। वे जब अपनी स्थानीय भाषा और हिंदी में आदिवासियों को संबोधित करती हैं, तो उनमें अपने अधिकारों के प्रति एक नया जोश भर जाता है। वे आधुनिक छत्तीसगढ़ की उन चुनिंदा महिलाओं में से हैं, जिन्होंने संघर्ष को ही अपना जीवन बना लिया है।




