मरवाही। रात का सन्नाटा, अंधेरी सड़क और घर लौटती एक महिला। लेकिन यह खामोशी अचानक तब टूट गई, जब पिपरिया गांव की 50 वर्षीय सुमित्रा देवी पर एक भालू ने हमला कर दिया। चीख़ों की गूंज सुनकर गांव के लोग दौड़े, किसी ने पत्थर उठाए तो किसी ने शोर मचाया और बड़ी मुश्किल से भालू को खदेड़ा गया। घायल सुमित्रा खून से लथपथ सड़क पर पड़ी थीं। सिर पर गहरे ज़ख्म और आंखों में खौफ था। तत्काल एम्बुलेंस बुलाई गई और उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया।
यह कोई पहली घटना नहीं थी। पिछले दो हफ्तों में मरवाही वनमंडल में भालुओं के हमले के कई मामले सामने आ चुके हैं। यही वजह है कि इस इलाके को लोग अब “भालू लैंड” कहने लगे हैं। जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं, और इंसानी बस्तियां फैलती चली जा रही हैं। नतीजा यह है कि जंगली जानवर अब अपनी भूख मिटाने बस्तियों का रुख कर रहे हैं।
भालू का हमला सिर्फ शारीरिक चोट नहीं देता, बल्कि पूरे समाज में डर और असुरक्षा की छाप छोड़ जाता है। जिन रास्तों से लोग निश्चिंत होकर गुज़रते थे, आज वही रास्ते खौफ़ का कारण बन चुके हैं। बच्चे और बुजुर्ग घर से बाहर निकलने से पहले कई बार सोचते हैं। महिलाएं अंधेरा होते ही बाहर जाने से डरने लगी हैं।
वन विभाग की टीमें लगातार गश्त कर रही हैं। जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं कि लोग जंगल के किनारे जाते समय सतर्क रहें, अकेले न निकलें और भालू को छेड़छाड़ न करें। लेकिन यह सतर्कता भी कहीं न कहीं असल सवाल को ढक देती है — आखिर क्यों इंसान और जानवर की दुनिया अब आमने-सामने आ खड़ी हुई है?
असलियत यह है कि इंसान ने जंगलों पर कब्ज़ा बढ़ा लिया है। जहां कभी जानवरों का घर था, वहां अब खेत और बस्तियां खड़ी हो गई हैं। पेड़ कटे, संसाधन सिमटे और जानवर भूख से बेहाल होकर गांवों की ओर बढ़े। भालू, तेंदुआ या हाथी — सबकी कहानी लगभग एक ही है। और इसकी सबसे बड़ी क़ीमत इंसान चुका रहा है, कभी ज़ख़्मों से, कभी जान देकर।
पिपरिया की सुमित्रा देवी का दर्द हमें यही याद दिलाता है कि इंसान और जानवर के बीच संतुलन बिगड़ा तो इसका असर दोनों पर पड़ेगा। इंसान सुरक्षा चाहता है और जानवर भोजन। लेकिन जब दोनों की ज़रूरतें एक-दूसरे से टकराती हैं, तो खून, आँसू और डर ही बचता है।
आज मरवाही की सड़कों पर सन्नाटा है, लेकिन उस सन्नाटे में सुमित्रा की चीख़ें अब भी गूंजती हैं। यह सिर्फ़ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है — जंगल और बस्ती की दूरी मिटती जा रही है, और इसकी क़ीमत इंसान चुका रहा है।




