KHABARWAAD NATIONL DESK. महाराष्ट्र का महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविध्यालय, वर्धा आजकल कईं कारणों से चर्चा में हैं, पहला तो इस कारण से कि कुलपति के रूप में दलित स्कालर प्रोफेसर लेल्ला कारूण्यकरा को हटाया जाना। क्योंकि वे अंबेडकरवादी हैं और जेएनयू से पढ़े लिखे दलित प्रोफेसर है, यह संघी विचारधारा की सरकार को बर्दाश्त नहीं है, ख़बर है कि न केवल उन्हें कुलपति पद से हटा दिया गया है बल्कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के पत्र के आधार पर विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की आपातकालीन बैठक में उन्हें निलम्बित करने का फैसला भी कर लिया गया है।
इसके अलावा दूसरा प्रहार इसी विश्वविध्यालय में दो साल से चलाए जा रहे आंबेडकर स्टडी सर्कल पर किया गया है, अब इसे वहाँ के संघी मानसिकता रखने वाले कार्यकारी कुलसचिव डॉ धरवेश कठेरिया द्वारा आदेश देकर बंद कर दिया गया है, ताकि लोग बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के भारत सरकार एवं महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशित साहित्य को बाबा साहेब की प्रतिमा के सामने न पढ़ सके। यह बाबा साहब के लेखों व भाषणों पर खुली चर्चा पर रोक लगाने के लिए किया गया है।
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बाबा साहब डॉ आंबेडकर की दुहाई देने वाली सरकार का यह असली चेहरा है, इतना ही नहीं बल्कि आंबेडकर विचारों के पाठ के आरोप में इस आंबेडकर स्टडी सर्किल से जुड़े सात शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस भी कुलसचिव धरवेश कठेरिया ने जारी कर दिया गया है और सभी कारण बताओ नोटिस इनकी व्यक्तिगत फाइल में भी लगवाए हैं, जबकि इनमें से चार के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की गई है।
इस स्टडी सर्कल के संयोजक डॉ शैलेश मर्जीकदम का ट्रांसफर विश्वविद्यालय के अमरावती जिले में स्थित रिद्धपुर केन्द्र पर कर दिया गया है। ग़ौरतलब है कि विश्वविद्यालय के सात आंबेडकरवादी दलित प्रोफेसर्स ने फरवरी 2022 में यूनिवर्सिटी में आंबेडकर स्टडी सर्कल इंडिया की शुरुआत की थी। इसकी बैठक हर गुरुवार को शाम 6 बजे के बाद विश्वविद्यालय में आंबेडकर की प्रतिमा के सामने होती थी और केंद्र और महाराष्ट्र सरकारों द्वारा प्रकाशित उनके एकत्रित कार्यों को पढ़ा जाता था और उन पर चर्चा की जाती थी।
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प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले दो सालों में करीब 61 सत्र आयोजित किए गए। वहीं इस साल जनवरी में रजिस्ट्रार इंचार्ज धरवेश कठेरिया ने इन सत्रों को बंद करने का आदेश दिया। कठेरिया ने सात शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा कि आंबेडकर के कार्यों को पढ़ने से सुरक्षा समस्याएं पैदा होंगी और विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा खराब होगी।
राजनीतिक सभाओं और मंचों पर डॉ आंबेडकर का गुणगान चल रहा है, परंतु उनके विचारों पर विमर्श को प्रतिबंधित किया जा रहा है, आंबेडकरवादी स्कालर कुलपति नहीं बन पाए और अगर बन जाये तो न केवल उनको हटाया जा रहा है बल्कि निलम्बित करके कार्यवाही की जा रही है, बाबा साहब आंबेडकर के लेखों और भाषणों पर चर्चा सत्र को ख़तरा बता कर रोका जा रहा है। शिक्षा के उच्च इदारों की यह हालत निराशाजनक है और इन पर किसी तरह की चर्चा और प्रतिरोध का नहीं होना और अधिक निराशा व चिंता की बात है।




