सूरज मानिकपुरी, कवर्धा। गौ माता के नाम पर छत्तीसगढ़ की राजनीति खूब चमकी है, लेकिन ज़मीनी सच इतना कड़वा है कि खुद गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष विशेषर पटेल को भी बोलना पड़ा। बुधवार को वे कवर्धा जिला पशु चिकित्सालय में निरीक्षण पर पहुंचे थे। यहां पत्रकार ने जब उनसे गौ माताओं के संरक्षण और चिकित्सा व्यवस्था को लेकर सवाल पूछा, तो पटेल का बेबाक जवाब सामने आया।
पटेल ने कहा कि “राजधानी रायपुर में तो पशु चिकित्सालय में डॉक्टरों की व्यवस्था है, लेकिन ज़िला स्तर पर स्थायी डॉक्टर की व्यवस्था कहीं भी नहीं है। सिर्फ राजधानी में है। उसके लिए पत्र व्यवहार किया गया है, उम्मीद है आगे व्यवस्था होगी।”
छत्तीसगढ़ में गौ-माता पर होने वाली राजनीति और जमीनी हकीकत बताते गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष @ChhattisgarhCMO @vishnudsai @BJP4CGState pic.twitter.com/3RPZfYET5Y
— khabarwaad (@khabarwaad) August 22, 2025
यानी राजधानी की गायें VIP ट्रीटमेंट में, और ज़िला स्तर की गायें डॉक्टर का चेहरा देखने को तरस रही हैं।
उन्होंने आगे बताया कि नई सरकार गौठान योजना को फिर से शुरू करने जा रही है। एक गौठान उन्हें देने की घोषणा हुई है, जहां गौवंशों को शिफ्ट कर सेवा की जाएगी। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि कवर्धा पशु चिकित्सालय में सिर्फ 15 गौवंश हैं—किसी का पैर टूटा है, किसी का हाथ टूटा है, और इलाज की व्यवस्था बस ‘जुगाड़’ से चल रही है।
राजनीति बनाम हकीकत
गौ माता पर छत्तीसगढ़ में हर सरकार ने अपनी-अपनी राजनीति की है। कभी गौठान योजना को लेकर शोर, कभी उसकी बंदी पर आरोप-प्रत्यारोप। लेकिन हकीकत यह है कि ज़िला स्तर पर न तो डॉक्टर हैं, न दवा, न स्थायी ढांचा।
आयोग अध्यक्ष का बयान इस बात की तस्दीक करता है कि गौ सेवा के नाम पर केवल सियासी शोभायात्रा हो रही है। डॉक्टर का इंतज़ाम कागज़ों पर है, ज़मीनी स्तर पर गायें अब भी टूटे पैरों और जख्मों के साथ भगवान भरोसे पड़ी हैं।
गौ माता की सेवा के नाम पर राजनीति भले ही ताक़तवर हथियार बनी हुई हो, लेकिन असल सेवा आज भी ‘पत्र व्यवहार’ और ‘घोषणाओं’ तक ही सीमित है। सवाल यह है कि क्या आने वाली सरकारें वास्तव में गायों के लिए स्थायी व्यवस्था देंगी या फिर गाय का नाम सिर्फ राजनीतिक गायन तक ही रह जाएगा?




