खैरागढ़-गंडई-छुईखदान। खैरागढ़ शहर में डायरिया से दो मौतें हो चुकी हैं, लेकिन असली बीमारी अस्पताल में नहीं, प्रशासन की लापरवाही में छुपी है। गंजीपारा की सीमा यादव और आमलीपारा के बुजुर्ग चंद्राकर की मौत ने साफ कर दिया कि दूषित पानी और कचरे के ढेर अब सिर्फ बदबू ही नहीं, मौत भी दे रहे हैं।
यह विडंबना ही है कि डायरिया का प्रकोप खैरागढ़ की विधायक यशोदा वर्मा के अपने गांव देवारीभाठ से शुरू हुआ। अब सवाल यह है कि अगर विधायक का गांव ही संक्रमण की चपेट में है, तो बाकी इलाकों का क्या हाल होगा?
शहर में मौतों की खबर के बाद लोगों में आक्रोश है। नागरिकों का कहना है कि नगर पालिका और स्वास्थ्य विभाग ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया, जिससे हालात बिगड़ते चले गए।
डॉक्टरों की सफाई बनाम हकीकत
सिविल अस्पताल के डॉक्टर पंकज वैष्णव ने मान लिया कि वजह दूषित पानी और गंदगी है। लेकिन यह तो हर आम नागरिक रोज देखता है—नालियां बजबजा रही हैं, पानी पीने लायक नहीं है, और ऊपर से कहा जा रहा है “स्थिति नियंत्रण में है।”
विधायक प्रतिनिधि का हमला
विधायक प्रतिनिधि मनराखन देवांगन ने नगर पालिका पर सीधा आरोप लगाया कि पानी की सफाई और गंदगी रोकने के उपाय ही नहीं किए गए। सच भी यही है—नगर पालिका का काम सिर्फ बैठकों और कागज़ी योजनाओं तक सिमटकर रह गया है।
खैरागढ़ में डायरिया नहीं फैला है, फैली है लापरवाही। और जब तक जिम्मेदार लोग “जिम्मेदारी” से बचते रहेंगे, तब तक यह गंदगी शहर की गलियों से सीधे लोगों की जान तक पहुंचती रहेगी।




